रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय हो’ में महान धर्मयोद्धा बंदा बहादुर के अप्रतिम बलिदान पर चर्चा
संदीप गौतम/न्यूज डेक्स संवाददाता
करनाल। महापुरुष जाति, धर्म, पंथ और संप्रदाय से ऊपर की विभूतियां हैं। उन्हें किसी खांचे में बांटने का हक किसी को नहीं है। महापुरुष किसी भी जाति विशेष के नहीं होते। इसलिए, ऐसा कोई भी प्रयास हमें नहीं करना चाहिए। दुर्भाग्य है कि आज महापुरुषों की जातियों पर विवाद पैदा करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है।
यह टिप्पणी हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय हो’ में महान धर्मयोद्धा बाबा बंदा सिंह बहादुर के अप्रतिम बलिदान पर चर्चा के दौरान व्यक्त किए। बाबा बंदा सिंह बहादुर, जो बाद में ‘बंदा बैरागी’ के नाम से जाने गए, के संघर्ष और उनकी बलिदान गाथा पर प्रकाश डालने के लिए इस चर्चा में शामिल थे कारपोरेट मामलों के मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारी डॉ. राज सिंह।
डॉ. चौहान ने कहा कि मुगल काल में भारतीय समाज पर अमानवीय अत्याचारों की पराकाष्ठा हुई। बाबा बंदा इन अत्याचारों के खिलाफ़ लड़ते हुए बलिदान हुए । इस तरह का अमानवीय अत्याचार भारत के किसी भी राजा ने किसी भी युद्ध में किसी भी शत्रु के साथ किया हो, ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता। सिख पंथ के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह के छोटे-छोटे बच्चों को दीवार में जिंदा चुनवा दिया जाना भी उसी तरह की अमानवीय घटना है।
डॉ. राज सिंह ने कहा कि भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में नहीं, बल्कि 1709 में ही शुरू हो गया था। एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन फ्रीडम स्ट्रगल में उल्लेख है कि मुगल आक्रांताओं के खिलाफ भारत का स्वाधीनता संग्राम वर्ष 1709 में ही बंदा बैरागी के नेतृत्व में शुरू हो गया था। डॉ. राज ने कहा कि यदि उस समय देश के अन्य राजाओं ने भी बंदा बैरागी का साथ दिया होता तो देश उसी समय मुगलों के कब्जे से मुक्त हो गया होता और हमें अंग्रेजों की गुलामी करने की नौबत ही नहीं आती। उस समय तक मुगल काफी कमजोर हो चुके थे। यदि उनके खिलाफ संगठित होकर लड़ाई लड़ी जाती तो हमारी जीत निश्चित थी। यह देश का दुर्भाग्य था और इन घटनाओं से काफी सबक लिया जा सकता है।
डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने पूछा कि बंदा बहादुर ने अपने दौर के इतिहास को किस हद तक प्रभावित किया और उनके जाने के बाद का दौर उनके बलिदान से कितना प्रभावित हुआ? डॉ. राज ने कहा कि 1709 से लेकर 1716 तक के बंदा बैरागी के संघर्ष के स्वर्णिम काल के बाद भारत में वैसा कोई योद्धा पैदा नहीं हुआ। इसके बाद लंबे समय तक पंजाब में शांति बनी रही।
उन्होंने कहा कि दिल्ली में लाल किले के सामने बंदा बैरागी के 4 साल के पुत्र का कलेजा चीर कर पिता के मुंह में जबरन ठूंस देना और शरीर का पुर्जा-पुर्जा काटने के बावजूद इस्लाम धर्म स्वीकार न करने के अपने प्रण पर कायम रहना शौर्य और पराक्रम की अद्भुत मिसाल है। इस लोमहर्षक घटना का संपूर्ण आंखों देखा ब्यौरा ईस्ट इंडिया कंपनी के दिल्ली स्थित एक अधिकारी ने कोलकाता के अपने मुख्यालय को भेजा था। इस घटना का वर्णन महान विभूतियों वीर सावरकर, गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी-अपनी कविताओं में किया है। इतिहास में ऐसे बर्बर, अमानवीय और पाशविक कृत्य का उदाहरण अन्यत्र कहीं नहीं मिलता।
डॉ. राज ने बताया कि बंदा बैरागी महान राष्ट्रभक्त एवं धर्म योद्धा थे। अधर्म के खिलाफ लड़ाई में उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनकी सेना में सभी जातियों और वर्ग के लोग शामिल थे। बंदा बैरागी ने किसानों को उनकी जमीन का मालिकाना हक भी दिलाया। 1684 मैं करीब 13-14 वर्ष की अल्पायु में राजौरी में जन्मे लक्ष्मण देव मन्हास वैराग्य की दीक्षा लेकर बंदा बैरागी के नाम से प्रसिद्ध हुए ।
उन्होंने बताया कि हरियाणा को बाबा बंदा बहादुर की कर्मभूमि से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ठिकाना होने का गौरव प्राप्त है। सेहरीखांडा सोनीपत के पास स्थित वह गांव है जहां महाराष्ट्र के नांदेड़ से लौटने के बाद बंदा बैरागी ने अपनी पहली सैनिक छावनी बनाई। यहाँ का निर्मोही अखाड़ा भी उनकी गतिविधियों का केंद्र बना रहा।
डॉ. चौहान ने कहा कि इसी प्रकार हरियाणा में स्थित लौहगढ़ बंदा बैरागी की राजधानी था। लौहगढ़ के संरक्षण के लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल की अध्यक्षता में ‘बाबा बंदा बहादुर लोहगढ़ फाउंडेशन’ का गठन किया गया है जिसने कार्य करना शुरू कर दिया है।
डॉ. राज ने बताया कि मुगलों से गुरिल्ला युद्ध के दौरान बाबा बंदा बैरागी हिमाचल प्रदेश भी रहे । वहां चंबा के राजा की भतीजी रामदेवी से उनका विवाह संपन्न हुआ। बंदा बैरागी धनुर्विद्या और तलवारबाजी में अत्यंत निपुण थे। मुगलों में उनका खौफ इतना था कि वर्ष 1715 में पंजाब के गुरदासपुर स्थित नंगल गांव में मुगलों के साथ चली लंबी लड़ाई के बाद जब उन्हें बंदी बनाया गया तो मुगल सैनिक उन्हें लोहे के बड़े से पिंजरे में कैद कर हाथी पर बैठा कर ले गए थे। उन्हें अपमानित कर दिल्ली में सरेआम इस तरह घुमाया गया था। बाबा बंदा बहादुर की कहानी हमारी युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत है।