Home Kurukshetra News राष्ट्रीय शिक्षा नीति में गुणवत्ता और नवोन्मेष को अधिक संबल: डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में गुणवत्ता और नवोन्मेष को अधिक संबल: डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा

by ND HINDUSTAN
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‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का क्रियान्वयन: हमारी भूमिका’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन
न्यूज डेक्स संवाददाता

कुरुक्षेत्र, 25 अगस्त। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान द्वारा मंगलवार को ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का क्रियान्वयन: हमारी भूमिका’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। संस्थान द्वारा आयोजित दसवें व्याख्यान में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, नोएडा के कुलपति प्रोफेसर भगवती प्रकाश शर्मा मुख्य-वक्ता रहे। संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह ने अतिथि परिचय कराते हुए बताया कि डॉ. भगवती प्रसाद शर्मा तीन बार विश्व व्यापार संगठन की मंत्रीस्तरीय बैठकों में प्रतिभागिता कर चुके हैं। उन्होंने देश एवं विदेशों में अनेक विस्तार व्याख्यान दिए हैं।

स्वाध्याय एवं अनुसंधान में गहन रुचि रखने वाले डॉ. शर्मा की सम-सामयिक विषयों पर 31 पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा मदन मोहन मालवीय पुरस्कार एवं विभिन्न समाचार पत्रों द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि संस्थान महत्वपूर्ण विषयों पर विभिन्न विद्वान वक्ताओं से सम्पर्क कर व्याख्यान को समाज, शिक्षकों तक पहुंचा रहा है। ये व्याख्यान भविष्य में प्रत्येक मंगलवार को सायं 4 बजे संस्थान के यूट्यूब चैनल, फेसबुक और ट्वीटर पर प्रसारित हुआ करेंगे।


मुख्य-वक्ता प्रोफेसर भगवती प्रकाश शर्मा ने कहा कि नीतियां केवल निर्णय लेने के लिए मार्गदर्शिकाएं होती हैं। समयबद्ध क्रियान्वयन के लिए निर्णय लेना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शिक्षक किसी भी संस्थान की आत्मा होता है। अच्छा शिक्षक वही है जो छात्रों को अधिक पढ़ने के लिए प्रेरित कर सके। यदि शिक्षा के प्रति उसका अनुराग नहीं है तो छात्रों को अधिक पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर सकेगा। इसीलिए अब सबसे बड़ी परीक्षा शिक्षकों की होगी कि नई शिक्षा नीति में गुणवत्ता और नवोन्मेष को अधिक से अधिक संबल देने के लिए उनका ज्ञान का स्तर भी उच्च होना चाहिए।


डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि हमें अपनी पाठ्य सामग्री को ठीक करना होगा। उन्होंने अभी से यह कार्य योजना बनाने पर बल दिया कि पहली से पांचवीं तक की पाठ्य पुस्तकों के लिए स्थानीय भाषाओं में लेखन की आवश्यकता की पूर्ति की जाए ताकि अगले सत्र से इस शिक्षा नीति पर आगे बढ़ते हैं तो कम से कम विद्यार्थियों को स्थानीय भाषाओं में साहित्य मिल जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की एक खास बात है कि शिक्षा और खेलकूद समान रूप से रोचक हो जाएंगे। अब छात्र का मूल्यांकन पढ़ाई या विषय के आधार पर ही नहीं बल्कि कक्षा 3, 5 और 8 में सभी विधाओं का मूल्यांकन किया जाएगा। कक्षा छठी से कौशल विकास प्रारंभ करने पर डॉ. शर्मा ने कहा कि छात्र को सिखाई जाने वाली स्किल का स्तर ऐसा होना चाहिए कि उस कौशल एवं प्रशिक्षण के उपरांत वह अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात उसी स्किल के क्षेत्र में अपना जीवन निर्वाह करना चाहे तो उसमें वह क्षमता होनी चाहिए। उसके आधार पर वह स्वतंत्र रूप से अपना कारोबार शुरू कर सकता है।


उन्होंने कहा कि छात्र के सर्वांगीण विकास के लिए किए गए प्रावधानों साहित्यिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, सामाजिक, भावनात्मक, शारीरिक क्षमता के विकास के लिए कोई न कोई अभ्यास क्रम उसके अध्यापन के साथ जोड़े जाएं। उसके लिए हमें ही सोचना होगा कि छात्र का भावनात्मक एवं सामाजिक विकास कैसे हो। उसमें नैतिक मूल्यों का प्रस्फुटन कैसे हो। आज की शिक्षा में उत्तीर्ण होकर निकलने वाले छात्रों के आचरण, व्यवहार और नैतिकता, जीवन मूल्यों को समावेश नहीं कर पा रहे हैं। शिक्षकों को इसके लिए चुनौती ठहराते हुए उन्होंने कहा कि हमें हजारों बोध कथाएं लिखनी होंगी, हजारों इनडोर खेल शुरू करने होंगे। समस्या आधारित शिक्षण के लिए हजारों समस्याओं का समावेश करना होगा और उनका हल भी खोजना होगा।


उन्होंने कहा कि हमें अभी से तैयारी शुरू करनी चाहिए कि विभिन्न कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में किस प्रकार की स्थानीय सामग्री और स्थानीय विरासत को स्थान देना चाहिए, यह सारा काम शिक्षकों पर ही है। उन्होंने नई शिक्षा नीति में कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों को तनावमुक्त करने की ओर इंगित किया कि अब छात्रों को वर्ष में एक बार नहीं दो बार परीक्षा देनी होगी। दोनों परीक्षाओं के अंक जोड़कर वार्षिक परिणाम दिया जाएगा। सेमेस्टर परीक्षा की तैयारी हमारी होनी चाहिए। अब शिक्षकों पर ही जिम्मेवारी है कि शिक्षा की गुणवत्ता और उसमें नवोन्मेष का समावेश हो, यह विद्यालय स्तर से ही छात्रों में श्रेष्ठतम गुणवत्ता लाने के लिए प्रयास करना होगा। शिक्षक का स्तर भी ऐसा ही होना चाहिए। उन्होंने वर्तमान शिक्षा पर कहा कि भारतीय आचार-विचार से शिक्षा निरंतर दूर होती गई और हमारा प्राचीन ज्ञान और सभ्यता की प्राचीनता इन्हें हम भुलाते चले गए। इसलिए नई पीढ़ी में राष्ट्रीयता का गौरव बोध धीरे-धीरे विलोपित होता गया।


उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रारंभिक बाल देखभाल शिक्षा हेतु दिए गए निर्देशों पर कहा कि 3 से 5 वर्ष तक के बच्चे का श्रेष्ठतम बौद्धिक विकास हो, उसे किस प्रकार की बोध कथाएं चुनानी हैं, किस प्रकार की भाषा शैली में बातें समझानी हैं, उसे किस प्रकार के खेल खिलाने हैं, उसका बौद्धिक शारीरिक विकास, उसकी तर्कक्षमता यह कल्पनाशीलता गांव-गांव में प्रारंभिक बाल देखभाल शिक्षा हेतु जो शिक्षक लगेंगे, उनको ही यह करना है। उन्होंने अतिथि एवं देशभर से जुड़े सभी श्रोताओं का धन्यवाद किया और सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना के साथ व्याख्यान का समापन हुआ।

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