तीन कृषि बिलों पर नमो और मनो को घेर चुके चौटाला,अपनी पार्टी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अरोड़ा और हुड्डा पर कर चुके हैं व्यक्तिगत वार
न्यूज डेक्स हरियाणा
चंडीगढ़। ताऊ देवीलाल परिवार की राजनीति का नाता सत्ता पक्ष से ज्यादा विपक्ष से रहा है। वैसे वर्तमान में ताऊ देवीलाल की विरासत तीन राजनीतिक दलों में बंटी है और चौथे हैं स्वयंभू यानी आजाद विधायक रणजीत सिंह चौटाला,जो सूबे की सरकार में बिजली मंत्री हैं और इससे पहले कांग्रेस में रह चुके हैं,मगर 2019 में आजाद प्रत्याशी के रुप में चुनाव लड़े,जीते और विधायक बनने के बाद भाजपा को समर्थन देकर बिजली मंत्री जैसे महत्वपूर्ण ओहदे पर हैं। बावजूद इसके वर्तमान में देवीलाल परिवार की सियासत प्रमुखता से तीन राजनीतिक दलों में बंटा दिखता है।
इनमें पहला बड़ा नाम इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला का है,जिन्हें ताऊ देवीलाल अपने हाथों से ना केवल अपनी राजनीतिक विरासत सौंप कर गए थे,बल्कि दो दशक पहले सत्ता की चाबी सौंप चौटाला को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाकर ही दुनिया से विदा हुए थे। उनकी राजनीतिक विरासत पर दावा ठोकने वाला दूसरा बड़ा नाम दुष्यंत चौटाला का है। वे 2018 में इनेलो से नाता तोड़ अपना राजनीतिक दल बना चुके हैं और 2019 में भाजपा से समझौता कर सत्ता पर काबिज हैं। दुष्यंत वर्तमान हरियाणा डिप्टी सीएम हैं। और तीसरा नाम है आदित्य देवीलाल,जिन्होंने राजनीति में पदार्पण से ही अपने नाम में देवीलाल को जोड़ा हुआ है,वे भाजपा के वर्तमान सिरसा जिला के अध्यक्ष हैं। आदित्य देवीलाल आम आदमी पार्टी में भी रह चुके हैं और बाद में आप को छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे।
मजेदार बात यह है कि ताऊ देवीलाल विरासत का झंडा लेकर सियासत कर रहे यह तीनों धड़े 2019 उनकी चुनावी जंग में शह मात की बाजी चल चुके हैं। तब बात जुदा इसलिए थी,क्योंकि बड़े चौटाला जेल में थे। हर खेल में हार-जीत होती है,यहां भी हुई थी,मगर वो जोश,जुनून और जज्बा नहीं दिखा,जो ओमप्रकाश चौटाला के जेल से बाहर होने पर दिख सकता था।अब जाकर जब चौटाला सजा पूरी होने के बाद जेल से बाहर हैं तो लोकसभा और हरियाणा में विधानसभा के चुनाव काफी दूर हैं। 90 वें बसंत की ओर बढ़ रहे चौटाला की सजा पूरी होने और जेल से बाहर आने की खबरों के साथ ज्यादा जोर इस बात पर दिया जा रहा था कि अब हरियाणा की राजनीति में अगले दिन उफान भरे होंगे। ठीक वैसा ही वातावरण दिखने भी लगा है। चाहे वो तीसरे मोर्चे के गठन की बात हो या हरियाणा में मध्यावधि चुनाव होने का बयान,तीन कृषि बिलों पर केंद्र सरकार की घेराबंदी के लिए किसानों के धरनास्थलों पर जाने का एेलान हो या पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पिता वाला बयान इन सबने खूब सुर्खियां बटौरी।
जब उन्होंने अपनी पार्टी इनेलो के 18 साल प्रदेशाध्यक्ष रह चुके पूर्व स्पीकर,पूर्व मंत्री अशोक अरोड़ा पर हुड्डा का ड्राईवर बनने वाला बयान दिया तो स्पेशल कवरेज के साथ न्यूज चैनलों ने चौटाला-अरोड़ा पर स्पेशल प्रोग्राम चला डाले। प्रिंट में भी चौटाला के बवाली बयानों को खूब तरजीत मिली। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर चटखारों के साथ यह रिपोर्ट खूब वायरल हुईं। इन सभी मामलों के बाद आज की सुर्खियां थोड़ी जुदा थी,जिसे मीडिया में इस तरह दिखाया जैसे चौटाला की फजीहत हुई हो। जाहिर है कि संयुक्त किसान मोर्चा शुरु में ही यह नियम बना चुका है कि किसी भी राजनीतिक दल के नेता को किसान आंदोलन के मंच पर आकर भाषण नहीं देने दिया जाएगा। तीन दिन पहले इनेलो के पूर्व विधायक और जिलाध्यक्ष रामफल कुंडू भी जब किसानों के बीच यह संदेश लेकर गए थे कि बड़े चौटाला 25 जुलाई को खटकड़ टोल पर किसान के धरनास्थल पर पहुंचेंगे तो उन्हें उसी समय इस बात से आगाह कर दिया गया था कि उन्हें यहां संबोधन करने का अवसर नहीं मिलेगा।
रविवार को जब चौटाला खटकड़ टोल पर पहुंचे तो वे एक सैकेंड के लिए माइक मांगते हुए सुनाई दिए। भीड़ के शोरगुल में चौटाला क्या बुदबुदा रहे हैं,इसमें सिर्फ एक सैकेंड वाली बात स्पष्ट सुनाई देती है। मगर उन्हें एक सैकेंड के लिए भी माइक नहीं थमाया गया और वे यहां से बैरंग हो गए। यहां एक किसान की थोड़ी गरमागरमी भी सुनाई देती है,मगर वो चौटाला से नहीं,बल्कि उनके साथ खड़े व्यक्ति से हुई। अब जब सब कुछ हो ही रहा था तो मीडिया कैमरे भी घूमें,इनका फोकस इस तरह से दिखा कि इसके बाद खूब चर्चा में रहा। यहां तक भी कई जगह लिखा गया कि नाराज होकर चौटाला मीडिया से भी बात किए बिना निकल गए। मगर चौटाला को जानने वाले यही कह रहे हैं कि वो मझे हुए खिलाड़ी है जनाब,उन्हे पता था कि माइक नहीं मिलेगा,ना भाषण के लिए ना राम राम के लिए। इसी बहाने चौटाला एक बार फिर चर्चा में आ गए। और इस तरह की चर्चाओं में वे अगले दिनों में नए नए कलेवर के साथ आने और दिखने वाले हैं,यह भी तय है।