विवाह, उत्सव, काज एवं सामाजिक आयोजनों का साक्षी रहा है बोहिया न्यूज डेक्स हरियाणा कुरुक्षेत्र,30 अगस्त। बोहिया लोकजीवन में सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़ा हुआ एक ऐसा प्रतीक है जो समाज में होने वाले अनेक उत्सवों, विवाहों एवं परम्पराओं का साक्षी है। बोहिये को देहात में डालड़ी, ठाठिया, बोन्ना, बोन्नी आदि अनेक नामों से जाना जाता है। बोहिया वास्तव में लुगदी, गेहूं, जौ, तिल्लियों, तूलियों, तूंत की बणसठियों से बनाया गया एक गोलाकार गहरा पात्र है। लोक में अनेक आकार एवं प्रकार के बोहिये लोकजीवन का हिस्सा हैं। इनमें लुगदी से बना बोहिया, दाब से बना बोहिया, तूलियों से बना बोहिया, गेहूं की नालियों से बना बोहिया, शहतूत की बणसठियों से बना बोहिया, बांस की फांचरियों से बना बोहिया आदि शामिल हैं। किन्तु लुगदी से बना बोहिया लोक पारम्परिक रूप से सर्वत्र लोकप्रिय एवं सार्वभौकिता का स्वरूप धारण किए हुए है।
इसको ठाठिया संभवत: इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें लड्डू एवं मिठाई ड़ाली जाती है। परिणामत: यह मिठाई खाने वालों के ठाठ कर देता है इसलिए इसे ठाठिया की संज्ञा दी गई है। विवाह एवं अन्य उत्सवों के अवसर पर महिलाएं बोहियों में गुड़, पताशे, चणों की बाकली, गेहूं की बाकली, खिलौने, शक्कर, मिठाई, सिरणी तथा प्रसाद भी बांटती हैं। इसके अतिरिक्त बोहिया घर में सामान एवं अनाज व दालें आदि रखने के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है।
आस-पड़ोस में सामान आदि देने के लिए भी बोहये का प्रयोग किया जाता है। लोकजीवन में किसी को खाली बोहिया देने की परम्परा नहीं है। ग्रामीण आंचल में जब किसी के घर बोहिये में कोई सामान दिया जाता है तो बोहिया वापिस करते समय उसमें कुछ न कुछ विषय-वस्तु एवं सामान बोहिया लौटाते समय उपहार एवं लोक परम्परा के रूप में दिया जाता है। वास्तव में बोहिया लेन-देन की संस्कृति का परिचायक है। गांव में विवाह के अवसर पर बुआ तथा बड़ी-बढ़ेरी महिला के सिर पर बोहिया होता है, जिसमें मिठाई एवं लड्डू होते हैं।
खेड़े, माता एवं तीर्थ आदि पर विवाह के अवसर पर घुड़चढ़ी के समय जो मिठाई चढ़ाई जाती है वह बोहिये का ही अंश होती है। विवाह में बोहिया केवल उसी महिला को सौंपा जाता है जो अनुभवी और जिम्मेवार हो। परिवार में बड़ी-बढ़ेरी, बुआ, ताई आदि को यह जिम्मेवारी सौंपी जाती है क्योंकि उनके पास मिठाई की खपत के सदुपयोग का वर्षों का अनुभव होता है। बोहिये में रोटियां बनाकर रखने की परम्परा भी है। बोहिये को छीक्के आदि पर भी रखा जाता है। तूलियों आदि से बने हुए बोहिये अत्यन्त आकर्षक होते हैं। महिलायें बोहियों के माध्यम से अपनी लोक सांस्कृतिक भावनाओं की अभिव्यक्ति इतने सुंदर तरीके से करती हैं कि बोहिये का सौन्दर्य स्वयं ही बोल उठता है।
वास्तव में बोहिया लोक संस्कृति का वह प्रमाण है जो सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़ा हुआ है। लुगदी के बोहिये को बनाने के लिए रद्दी कागज को कम से कम पन्द्रह दिन तक पानी में भिगोकर रखा जाता है। इन पन्द्रह दिनों की अवधि में कम से कम दो बार पानी को बदला जाता है। पन्द्रहवें दिन कागज को पानी से निकाल कर अच्छी तरह निचोड़ लिया जाता है। इसके बाद लकड़ी से बनी थापी से पीट-पीट कर उसकी लुगदी तैयार की जाती है। इसके अलावा ग्रामीण अंचल में लुगदी को ओखल में मूसल के साथ कूटकर बारिक बना लिया जाता है। इसके अतिरिक्त लुगदी में मुल्तानी मिट्टी, कीकर का गोंद, मेथी तथा नीम के पत्ते आदि भी ड़ालने की परम्परा है।
नीम के पत्ते एवं मेथी लुगदी को कीड़ों आदि से बचाने के लिए ड़ाले जाते हैं। लुगदी तैयार होने पर मिट्टी के बर्तनों को उल्टा कर उसके ऊपर कपड़ा आदि ड़ालकर लुगदी के बोहिया को बनाने की प्रक्र्रिया शुरू होती है। वास्तव में बोहिये को उल्टे स्वरूप में बनाया जाता है। सबसे पहले उसका आधार तैयार किया जाता है। उसके पश्चात उसकी तली तैयार की जाती है। तली को विकसित करते हुए उसको गोलाकार प्रदान किया जाता है और बाद में उसके किनारों को कलात्मक स्वरूप प्रदान किया जाता है।
वास्तव में किनारों एवं तली के माध्यम से लोक पारम्परिक कला का वही स्वरूप देखने को मिलता है जो आज से लगभग तीन से चार हजार वर्ष पहले खुदाई में निकले बर्तनों के किनारों पर देखने को मिलता था। लुुगदी के बोहिये के किनारों को अनेक स्वरूप में बनाया जाता है। सामान्य रूप से बनाये गए किनारे बिल्कुल सीधे-सपाट होते हैं। जबकि कलात्मक स्वरूप में बनाए गए किनारे की कोर को मोटा बनाकर उसको गीले स्वरूप में काट देते हैं। इस प्रकार ग्रामीण अंचल में अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाएं अपनी सामथ्र्य एवं कलात्मक अभिव्यक्ति के अनुसार बोहिये को आकार एवं स्वरूप प्रदान करती हैं। बोहिये को मटके आदि की तली के ऊपर आकारानुरूप बनाया जाता है। जब यह सूख जाता है तो इसके ऊपर मुल्तानी मिट्टी का लेप कर इसे सौन्दर्य प्रदान किया जाता है। उसके पश्चात इस पर अनेक कलात्मक चित्रांकन भी किया जाता है।
फूल, पत्ते, पक्षी, शेर आदि लोक कलात्मक चित्तण बोहियों को और अधिक सुंदर एवं आकर्षक बनाता है। बोहिये के किनारे एवं तली के साथ विशेष कलात्मक अभिव्यक्ति तीखे रंगों के साथ प्रस्तुत की जाती है। अनेक स्थानों पर थोड़ी सी गिल्ली लुगदी में भी नैसर्गिक रंगों के साथ कलात्मक अभिव्यक्तियां प्रदान की जाती हैं जिससे रंग लुगदी में समाहित हो जाते हैं और बोहिये का सौन्दर्यात्मकता देखते ही बनती है। लुगदी जब सूख जाती है तो मिट्टी के बर्तनों की तली से बोहिये को उतार लिया जाता है और उसके पश्चात महिलाएं अपनी चित्तण कला के माध्यम से इसको और अधिक आकर्षक बनाने का काम करती हैं। बोहिये के अनेक आकार एवं प्रकार होते हैं। छोटे बोहिये को बोन्नी कहा जाता है।
बड़ा बोहिया मूलत: घर में अनाज व दालें आदि रखने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। उत्सवों के अवसर पर मध्यम आकार के बोहियों का प्रचलन ज्यादा है। लडक़ी की विदाई के अवसर पर बोन्नी देने की परम्परा भी है। बोन्नी लुगदी से ही बनी होती है। इसमें मिठाई ड़ालकर लडक़ी पक्ष की ओर से लडक़ी के साथ ही भेजी जाती है। इसके अतिरिक्त हरियाणवी लोकजीवन में बोहिया अनेक लोक सांस्कृतिक परम्पराओं का साक्षी है। माँ बोहिये में अपनी बेटी के गर्भ के समय भाजी भेजती है। जिसे बोझ बांधणा भी कहा जाता है।
देहात में बोहिये से जुड़े हुए अनेक मुहावरे एवं लोकोक्तियां लोकजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उदाहरण के लिए- बोहिया सिर पै ठाये फिरणां, बोन्नी सा मुंह राखणा, सिर पर बोहिया धरणा, नीरे बोहिये बनाणा, बोहिये के लाड्डू होणा, बोहिया उठवाणा, बोहिया बेचणा, बोहिया बणाते फिरणा, बोहिया संभालणा, निरा बोहिये बेचण का आदि-आदि आदि लोकप्रिय हैं। लोकजीवन में बोहिये की परम्परा अतीत का हिस्सा बनते जा रही है। बोहिया नहीं देहात में सांस्कृतिक परम्परा एवं लोककला का पारम्परिक स्वरूप मिट रहा है। जबकि पर्यावरण एवं वैज्ञानिक दृष्टि से बोहिया घर में अनावश्यक कागजों को सदुपयोग करने का कलात्मक स्वरूप है। इसको नये स्वरूप में ढ़ालकर लुगदी के माध्यम से अनेक खिलौने, बोन्नी, ढ़क्कनदार बोन्नी, सामान रखने के लिए विविध आकार के पात्र, गुड्डे-गुडिय़ा, सामान रखने के विविध आकारात्मक पात्र लुगदी के माध्यम से दैनिक प्रयोग की विषय-वस्तुओं के रूप में ढ़ालकर व्यवसायिक तरीके से भी प्रस्तुत किया जा सकता है।
इस प्रकार बोहिया ग्रामीण संस्कृति का वो हिस्सा रहा है जिसके बिना विवाह एवं उत्सवों का संपन्न हो पाना मुश्किल ही नहीं असंभव था। वह घर के प्रत्येक काज, उत्सव, विवाह आदि के रूप में साक्षी की भूमिका निभाकर परम्परा को आगे बढ़ाने में अह्म भूमिका निभाता रहा है। आज ग्रामीण संस्कृति का यह अंश बोहिया अपने अतीत पर गौरवान्वित तो महसूस करता होगा, किन्तु भविष्य के स्वरूप को देखकर वह अपने वजूद के ऊपर मंडऱाते हुए खतरे के बादलों से अपने आपको घायल भी महसूस कर रहा होगा। हालांकि आंशिक रूप में अब भी गांवों में महिलाएं बोहिये बनाती हैं। घर-घर बोहिये बनाने की परम्परा समाप्त हो चली है। आवश्यकता है इसको कुटीर उद्योग के साथ जोडक़र नये स्वरूप में प्रस्तुत करने की। प्रतिक्रिया हेतु आपके विचार सादर आमंत्रित है। डा.महा सिंह पूनिया निदेशक युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र