मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय श्रीमद्भगवद्गीता जयंती समारोह-2021 के उपलक्ष्य में श्रीमद्भगवद्गीता-अवसाद से आनन्द की यात्रा विषय पर व्याख्यान कार्यक्रम संपन्न
न्यूज डेक्स संवाददाता
कुरुक्षेत्र।
श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या के अनुसार स्वस्तिभाव की कुंजी बिना इच्छा के बिना कामना के आनंद की अनुभूति में होती है। हमारा मानस ही सारी उथल-पुथल की जड़ है। इच्छाओं को कम करने में ही शांति है। हमें इच्छाओं का दास नहीं होना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित मानव जीवन दर्शन दुनिया का सर्वश्रेष्ठ जीवन दर्शन है। यह विचार अंतरराष्ट्रीय श्रीमद्भगवद्गीता जयंती समारोह-2021 के उपलक्ष्य में मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा आयोजित अठारह दिवसीय कार्यक्रम के सोलहवें दिवस मिशन के आश्रम परिसर फतहुपुर में श्रीमद्भगवद्गीता-अवसाद से आनन्द की यात्रा विषय पर व्याख्यान ऑल इंडिया इमाम ऑगेनाजेशन के मुख्य इमाम डॉ. इमाम उमेर अहमद इलियासी ने व्यक्त किए।
कार्यक्रम का शुभारंभ भारतमाता एवं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के चित्र पर माल्यार्पण, पुष्पार्चन एवं दीपप्रज्जवलन से कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ऑल इंडिया इमाम ऑगेनाजेशन के मुख्य इमाम डॉ. इमाम उमेर अहमद इलियासी एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने संयुक्त रूप से किया। मातृभूमि सेवा मिशन पहुंचने पर ऑल इंडिया इमाम ऑगेनाजेशन के मुख्य इमाम डॉ. इमाम उमेर अहमद इलियासी का वैदिक ब्रह्मचारियों ने शंख धवनि एवं वैदिक मंत्रोच्चारण से स्वागत किया। मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय श्रीमद्भगवद्गीता जयंती समारोह-2021 के उपलक्ष्य में ऑल इंडिया इमाम ऑगेनाजेशन के मुख्य इमाम डॉ. इमाम उमेर अहमद इलियासी को सामाजिक समरसता के क्षेत्र में योगदान के लिए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने मातृभूमि गौरव सम्मान प्रदान किया।
डॉ. इमाम उमेर अहमद इलियासी ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता मानव समाज के लिए अवसाद से आनंद की यात्रा का महान ग्रंथ है। आज हमें श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं को आत्मसात कर अखंड भारत के लक्ष्य को प्राप्त करना होगा। राष्ट्र धर्म से सर्वोपरि है। आज दुनिया के अवसाद ग्रस्त लोगों का श्रीमद्भगवद्गीता ही मार्गदर्शन करने में सक्षम है। भारतीय संस्कृति धर्म एवं दर्शन विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है। भारत में संपूर्ण विश्व को ज्ञान एवं विज्ञान दिया है। आज के दौर में चिंता, अवसाद और तनाव निरन्तर बढ़ रहे हैं। बढ़ती इछाओं की पूर्ति न होने पर क्षोभ और कुंठा होती है। तब आक्रोश और हिंसा का तांडव शुरू होने लगता है। श्रीमद्भगवद्गीता पूरे व्यक्तित्व का परिष्कार करती है और इसके लिए जीवन जीने की प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराती है। डॉ. इलियासी ने मातृभूमि सेवा मिशन के सेवा प्रकल्पों की सराहना करते हुए कहा कि मातृभूमि सेवा मिशन विश्व बंधुत्व के क्षेत्र में बहुत ही अनुकरणीय कार्य कर रहा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता के आरम्भ में अर्जुन, सबसे योग्य धनुर्धर और महारथी विषाद से ग्रस्त होते हैं। वे युद्धस्थल में अपनों को विरोधी सेना में देख किंकर्तव्यविमूढ़ हैं कि क्या करें क्या न करें। इस तरह की द्वंद्व और तनाव की स्थिति आज भी हर कोई अनुभव करता रहता है। श्रीमद्भगवद्गीता में सुख मनुष्य के अंतस में है बाहर की दुनिया में उसकी खोज व्यर्थ और निष्फल ही होती है। बाहर की सुखदायी प्रसन्नता क्षणिक है और वस्तुओं पर टिकी होने से एक खालीपन के अहसास को जन्म देती है। इस हालत में मन किसी दूसरे और फिर उसके बाद किसी और आकर्षण की ओर दौड़ता रहता है। इसलिए श्रीमद्भगवद्गीता का निर्देश है कि अपने ऊपर अपने आत्म के ऊपर नियंत्रण स्थापित करो और अवसाद से मुक्त होकर आनंद को प्राप्त करो। कार्यक्रम में आभार ज्ञापन मातृभूमि शिक्षा मंदिर के प्रबंधक रामपाल आर्य ने किया। कार्यक्रम का संचालन डीन सी.एस.एम.सी., चितकारा विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के डॉ. आशुतोष मिश्र ने किया। कार्यक्रम में अनेक सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि जन उपस्थित रहे।