अखिल भारतीय फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन मास्टर क्लास में बहुचर्चित फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री पहुंचे
पहली मास्टर क्लास में चाणक्य फेम फिल्मकार डा.चंद्रप्रकाश द्विवेदी
और दूसरी मास्टर क्लास में विवेक अग्निहोत्री ने भारतीय फिल्मों के सफर पर डाला प्रकाश
नहीं होनी चाहिए सेंसर बोर्ड की कैंची,फिल्म का सिर्फ सर्टिफिकेशन होना चाहिए कि कौन देख सकता है कौन नहीं-अग्निहोत्री
एनडी हिंदुस्तान संवाददाता

चंडीगढ़। प्रसिद्ध फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री की आने वाली फिल्म दिल्ली फाइल पिछले 100 साल में हुए हिंदुओं के नरसंहार से जुड़ी होगी। आज यहां भारतीय चित्र साधना के पांचवें फिल्म फेस्टिवल में मास्टर क्लास में श्रोताओं से रूबरु होते हुए विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि 100 पहले हुए मोपला नरसंहार से लेकर अब तक हुए नरसंहारों में हजारों लोगों की जान गई है। यह इतिहास खून खराबे का इतिहास है।बंगाल में हुए डायरेक्ट एक्शन डे में ही 20 हजार हिंदुओं की हत्या कर दी गई थी। कई बार कहानी को ना कहना भी गुनाह है। समाज में जो कहानी घटी उसे भी बताना चाहिए। दिल्ली फाइल के माध्यम से मैं इसी इतिहास के ऊपर कहानी कहना चाह रहा हूं। उन्होंने आह्वान किया कि सोशल मीडिया के माध्यम से हम अपनी और अपनी परिवार की और अपनी गली की छोटी छोटी कहानियों से स्पेस को भर दें। यही आगे काम आएगा। जब समाज के साझा मुद्दे कहानियों में आ जाते हैं,तो वह समाज को आगे ले जाने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि पहले फिल्मों के अंदर हिंदुस्तान जिंदा था,लेकिन अब फिल्मों से हिंदुस्तान गायब हो रहा है। फिल्मों में देश को वापस लाने की जरूरत है।जो फिल्में बना रहे हैं,वे नहीं जानते के किनके लिए बना रहे हैं। अब हमारी फिल्में आम आदमी से दूर चली गई है और आम आदमी भी फिल्मों से दूर चला गया है। उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास को समझना है तो भारत की फिल्मों के खलनायक को समझें। उन्होंने कहा कि देश की आजादी से लेकर अब तक हर दशक में फिल्मों की यात्रा में खलनायक बदलते रहे हैं और यही खलनायक है देश के फिल्मकार की मानसिकता को समझने मे सहायक होते हैं।
मीडिया से रुबरु हुए विवेक अग्निहोत्री,खुलकर दिया सवालों का जवाब
मास्टर क्लास के बाद विवेक अग्निहोत्री मीडिया से रुबरु हुए और खुलकर उनके सवालों का जवाब दिया। इस बातचीत में एजेंडा फिल्म,फिल्मों और ओटीटी प्लेटफार्म के लिए सेंसर बोर्ड की भूमिका,धर्मपरिवर्तन और उनकी आने वाली फिल्मों पर सवाल जवाब का सिलसिला करीब एक घंटे तक जारी रहा। सबसे अहम बात यह रही कि उन्होंने कहा कि अगर मुझे कोई कहता है कि मैं एजेंडे के तहत फिल्में बनाता हूं तो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है,क्योंकि सामान्य कार्य से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक में एजेंडा चलता है।
मैं भारत का इकलौता फिल्मकार जो 4-4 वर्ष के रिसर्च के बाद प्लान करता है फिल्म
मैं फिल्में सूझबूझ और पूरी रिसर्च करके बनाता हूं।मुझे स्वयं में यह कहते हुए अतिश्योक्ति महसूस नहीं होती कि मैं भारत का इकलौता ऐसा फिल्मकार हूं,जो एक फिल्म के निर्माण के लिए 4-4 वर्ष तक गहन शोध के बाद कम उस विषय पर फिल्म निर्माण का प्लान तैयार करने की हिम्मत रखता है।कई बार मेरे खिलाफ फतवे जारी होते हैं, मुझे धमकियां भी मिलती है,मुझे इसकी परवाह नहीं है।हां इसकी वजह से मुझे वाई सिक्योरिटी में चलना पड़ रहता है बस।मैं अपने अपने कार्य को पूरी ईमानदारी के साथ अपने राष्ट्र के लिए कर रहा हूं। फिर चाहे इसे कोई एजेंडा कहता तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
एजेंडा कोई बुरी चीज नहीं-अग्निहोत्री
वैसे एजेंडा कोई बुरी चीज भी नहीं है। फिल्मों और ओटीटी प्लेटफार्म पर परोसी जा रही सामग्री पर सेंसर बोर्ड की भूमिका पर पूछे गए सवाल पर अग्निहोत्री ने कहा कि मैं तो यह चाहता ही नहीं कि सेंसर बोर्ड हो। हालांकि मैं वर्तमान में खुद सेंसर बोर्ड का सदस्य हूं।मैं सेंसर बोर्ड में फिल्में अटकने का दर्द महसूस कर चुका हूं।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि किस कमरे में बच्चे आ सकते हैं,किसमें नहीं,जैसे यह तय होता है,इसी प्रकार फिल्मों और ओटीटी प्लेटफार्म के लिए सिर्फ सर्टिफिकेशन ही होना चाहिए,इसके लिए सेंसर बोर्ड की कैंची की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि लोगों की स्मृति कमजोर हो रही है। लोग अपने पिता,दादा,परदादा का अतीत और उनके द्वारा किए गए राष्ट्रहित के कार्य तो दूर उनके पास इनकी एक फोटो तक नहीं होती।मैं चाहता हूं कि लोग अपने अतीत और गौरव को समझें।उन्होंने इस बातचीत में यह भी बताया कि द ताशकंद फाइल और कश्मीर फाइल के बाद अब उनकी अगली फिल्म होगी द दिल्ली फाइल्स।
फिल्मों में एजेंडा होने की बात से में इत्तेफाक नहीं रखता-डा.चंद्रप्रकाश द्विवेदी
भारतीय सिनेमा मनोरंजन या एजेंडा विषय पर भारतीय चित्र साधना के नेशनल फिल्म फेस्टिवल में शुक्रवार को चाणक्य सीरियल फेम फिल्मकार डा.चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा कि मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता की फिल्मकार किसी एजेंडे को लेकर फिल्म तैयार करता है।उन्होंने कहा कि भारतीय फिल्मों में एजेंडा नहीं है,लेकिन यह होना चाहिए। इससे सब प्रभावित होते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने चाणक्य धारावाहिक बनाया,इसमें मेरा कोई एजेंडा नहीं था। वह मेरी प्रतिबद्धता थी और यह प्रतिबद्धता यह थी कि भारत एक सनातन राष्ट्र है। डा.द्विवेदी ने कहा कि फिल्मों के खिलाफ होने वाले धरने प्रदर्शनों के पीछे एक राजनीतिक स्वार्थ होता है। उन्होंने कहा कि एेसी फिल्में बहुत कम हैं,जिन्हें विचारवान लोगों ने बनाया। फिल्मकार का उद्देश्य यह रहता है कि उसकी फिल्म सफल हो। मेरी फिल्म पृथ्वीराज सफल नहीं हुई,तो इसके कारण मुझे मेरी अन्य पांच फिल्में छोड़नी पड़ी।