Home Kurukshetra News प्रेरणा वृद्धाश्रम के बुजुर्गों के आशीर्वाद से बच्चों को संस्कार देने का प्रेरणा का प्रयास

प्रेरणा वृद्धाश्रम के बुजुर्गों के आशीर्वाद से बच्चों को संस्कार देने का प्रेरणा का प्रयास

by ND HINDUSTAN
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प्रेरणा वृद्धाश्रम की संस्कार शाला में पहुंच रहे हैं बच्चे

न्यूज़ डेक्स संवाददाता

कुरुक्षेत्र । नगर का प्रेरणा वृद्धाश्रम अब केवल अपनों से ठुकराए व घरों से निकाले बुजुर्गों को आश्रय ही नहीं दे रहा है बल्कि वृद्धाश्रम अब संस्कारशाला का रूप ले चुका है। प्रेरणा के संस्थापक एवं साहित्यकार डा. जयभगवान सिंगला ने बताया कि प्रेरणा वृद्धाश्रम में प्रतिदिन कोई ना कोई संस्कार देने वाला प्रोग्राम होता रहता है। इसी कड़ी में नगर डी.ए.वी. स्कूल के करीब डेढ़ सौ बच्चे बुजुर्गों से मिलने तथा आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचे। इस मौके पर माहौल काफी मार्मिक नजर आया जब सभी बुजुर्गों ने बच्चों को ऐसे गले लगाया जैसे पोते पोतियों व दोहते दोहतियों से मिले हों। सभी बच्चों ने बुजुर्गों के पांव छूकर उन से प्यार एवं आशीर्वाद पाया। इन बच्चों के साथ विशेष रूप से स्कूल की प्रधानाचार्या मनीषा लांबा, दीपिका, सविता बत्रा, सम्पदा, उषा दलाल, मंजुला, जस्सी व हरद्वारी इत्यादि भी मौजूद रहे। बच्चों ने बुजुर्गों को देशभक्ति के गीत सुनाए और कविता पाठ किया। प्रेरणा के संस्थापक डा. जय भगवान सिंगला, आशा सिंगला और प्रेरणा की सक्रिय सदस्या हरबंस कौर ने अंग वस्त्र पहना कर सभी अध्यापिकाओं का सम्मान किया और बच्चों को भी उपहार स्वरूप चीजें भेंट की। डा. जय भगवान सिंगला ने आश्रम में बच्चों को शपथ दिलाई कि हम सदा अपने बड़े बुजुर्गों का सम्मान करेंगे। अपने दादा दादी को कभी भी वृद्धाश्रम नहीं भेजने देंगे। बच्चों के साथ आई प्रधानाचार्या मनीषा लांबा ने कहा कि यहां वृद्धाश्रम में आकर हमारे बच्चों ने आज बहुत कुछ सीखा है। उन्होंने बुजुर्गों का सम्मान करने की प्रतिज्ञा ली है और यहां बुजुर्गों से उनके पांव छूकर आशीर्वाद लिया है। इस अवसर पर बच्चों के साथ आई अध्यापिकाओं ने वृद्धाश्रम में रहने वाली माताओं के साथ मिलकर खूब गीत गाए और नृत्य भी किया। डा. हरबंस कौर ने कहा कि नगर के सभी स्कूलों से यह आग्रह करेंगे कि वह भी समय-समय पर अपने संस्थान के बच्चों को यहां भेजें ताकि बच्चों में अच्छे संस्कार आए और वह बड़े होकर देश के अच्छे नागरिक बने। प्राचार्या मनीषा लांबा ने कहा कि मैंने अपने जीवन में आज तक इतना सुंदर आश्रम नहीं देखा, जहां पर बुजुर्गों की निशुल्क इतनी सेवा होती हो और जिसके प्रांगण में मंदिर भी हो, शहीद स्मारक भी हो, लाइब्रेरी भी हो और साहित्य सृजन के लिए साहित्य शोध संस्थान भी हो। आशा सिंगला ने वृद्धाश्रम परिसर में बन रहे सांस्कृतिक संग्रहालय को भी बच्चों को दिखाया जिसमें सौ से दो सौ साल पुरानी चीज देखकर बच्चे हैरान रह गए। आज तक इन बच्चों ने कभी लालटेन नहीं देखी थी। पुराने रेडियो, पुराने टेलीविजन और पुराने सिक्के नहीं देखे थे। विदाई देते समय डा. जय भगवान सिंगला ने अपनी पुस्तक खुशी अपनी मुट्ठी में सबको भेंट किया।

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