Home Kurukshetra News विरासत एएचए सांझी उत्सव का समापन 1 अक्टूबर को

विरासत एएचए सांझी उत्सव का समापन 1 अक्टूबर को

by ND HINDUSTAN
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सांझी की साज-सज्जा में किया जाता है लोक प्रतीकों का प्रयोग

एनडी हिन्दुस्तान

कुरुक्षेत्र:
 विरासत दि हेरिटेज विलेज जी.टी. रोड मसाना में विरासत हेरिटेज व एसोसिएशन ऑफ हरियाणवीज इन ऑस्ट्रेलिया के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे सांझी उत्सव-2025 का समापन 1 अक्टूबर को किया जायेगा। यह जानकारी विरासत एएचए सांझी उत्सव के निदेशक अभिनव पूनिया ने दी।
उन्होंने बताया कि विरासत हेरिटेज विलेज एवं एएचए संस्कृति संरक्षण के लिए परंपराओं को सहेजने के लिए पिछले काफी समय से प्रयास कर रहे हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि में सांझी लुप्त होती एक ऐसी लोककला है जिसको लोकजीवन में महिलाएं सदियों से बनाती आ रही हैं। इस लोककला को गोबर और मिट्टी से प्राकृतिक स्वरूप में बनाया जाता है। इसकी साज-सज्जा के लिए जहां एक ओर नैसर्गिक रंगों का प्रयोग होता है वहीं पर दूसरी ओर प्रतीकों के माध्यम से भी सांझी की साज-सज्जा की जाती है। लोक प्रतीक सांझी की सजावट में चार चांद लगाने का कार्य करते हैं। अभिनव ने बताया कि सांझी एक प्राकृतिक लोककला है, इसमें जो भी रंग एवं सामग्री प्रयोग होती है वह पर्यावरण के लिए बिल्कुल भी नुकसानदायक नहीं है। मिट्टी एवं गोबर से बनी सांझी के ऊपर गेरूए एवं सफेद रंग का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी के सितारों एवं सांझी के अंग-प्रत्यंगों को इन्हीं रंगों से सुसज्जित किया जाता है। पहले दीवार पर गोबर लगाया जाता है और उसके ऊपर मिट्टी से बनी हुए सितारों एवं अंग-प्रत्यंगों से सांझी बनाई जाती है। लोककला की दृष्टि से सांझी लोकजीवन की ऐसी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है जिसमें आंचलिकता के दर्शन होते हैं। संस्कृति संरक्षण केवल इतिहास को बचाने का कार्य नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान और सामाजिक मूल्यों को जीवित रखने का माध्यम भी है। समाज के हर वर्ग को इसमें सहयोग करना चाहिए ताकि भारत की समृद्ध संस्कृति विश्व पटल पर और अधिक उजागर हो सके।
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प्रकृति संरक्षण के लिए किया जाता है लोक प्रतीकों का प्रयोग: डॉ. महासिंह पूनिया

हरियाणवी संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. महासिंह पूनिया ने बताया कि बदलते दौर और आधुनिकता की दौड़ में जहां परंपराएँ और लोक कलाएँ धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं, वहीं संस्कृति संरक्षण को लेकर और बड़े स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सांझी बनाने के लिए अनेक लोक प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है। इसके अंदर मिट्टी की चिडय़ा बनाई जाती, सांझी की सखी धुंधी बनाई जाती है। सांझी के सजने संवरने के लिए कंघा एवं शीशा बनाया जाता है, पारिवारिक उन्नती की परिचायक सीढ़ी बनाई जाती है, हवा करने के लिए बीजणा बनाया जाता है। सौम्यता एवं शीतलता प्रदान करने के लिए चन्द्रमा का निर्माण किया जाता है। रोशनी एवं जीवन के लिए सूर्य बनाया जाता है। गतिशीलता एवं उत्सुकता के लिए चिडिय़ों का निर्माण किया जाता है। उत्साह एवं उल्लास का प्रतीक मोर बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि हरियाली एवं सौहार्दता का प्रतीक तोता बनाया जाता है। पारिवारिक समृद्धता के लिए कमल का निर्माण किया जाता है। शुभता के लिए स्वास्तिक चिह्न बनाया जाता है। फलने-फूलने के लिए बेल-बूटे बनाये जाते हैं। विष्णु एवं लक्ष्मी के पांव की छाप के लिए पैरों के प्रतीक बनाये जाते हैं। पावनता एवं पवित्रता के लिए कलश का निर्माण किया जाता है। डॉ. पूनिया बताया कि इसके अतिरिक्त पशु धन की खुशहाली के लिए गाय एवं बैल बनाये जाते हैं। सांझी के पैरों में जौ बीजे जाते हैं जो पारिवारिक उन्नति का परिचायक है। इस प्रकार लोकजीवन में सांझी स्वयं दुर्गा एवं शक्ति का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोडऩा बेहद आवश्यक है। इसलिए सांझी उत्सव के साथ-साथ अन्य आयोजन भी संस्कृति संरक्षण के लिए समय-समय पर किये जाने अति आवश्यक हैं।

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