Home Kurukshetra News धर्मजीवी कॉलेज में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

धर्मजीवी कॉलेज में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

by ND HINDUSTAN
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एनडी हिन्दुस्तान

कुरुक्षेत्र। धर्मजीवी इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल एजुकेशन में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हाइब्रिड मोड (ऑनलाइन एवं ऑफलाइन) में सफलतापूर्वक किया गया। संगोष्ठी का विषय था—“दिव्यांग व्यक्तियों का सशक्तिकरण: बाधाओं को तोड़ते हुए समावेशन की ओर”।

इस संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. जसविंदर सिंह (सहयोगी प्रोफेसर, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब, बठिंडा) एवंडॉ. रंजीता सैनी (सहायक प्रोफेसर, शिक्षा विभाग, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, मोहाली) ने अपनी ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायी प्रस्तुतियों के माध्यम से कार्यक्रम को गरिमामय बनाया।संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों के समक्ष आने वाली सामाजिक, शैक्षणिक एवं संरचनात्मक चुनौतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उनके सशक्तिकरण एवं समावेशन हेतु प्रभावी रणनीतियों पर विचार-विमर्श करना था।इस अवसर पर संस्थान की प्राचार्या डॉ. शालिनी राजपूत सहित कॉलेज स्टाफ—डॉ. सुदेश तनेजा, डॉ. प्रीति, डॉ. मीनाक्षी शर्मा, डॉ. सुमित शर्मा, सुमित, दीपिका, सरोज, काजल, रितु, शिवम एवं डॉ. रविंदर सिंह—की सक्रिय सहभागिता ने संगोष्ठी की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में एक समावेशी समाज के निर्माण, दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों तथा उनके सामने आने वाली बाधाओं के व्यावहारिक समाधान पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया। दोनों मुख्य वक्ताओं की प्रभावशाली एवं विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों के परिणामस्वरूप यह संगोष्ठी अत्यंत सफल, प्रेरक एवं सार्थक सिद्ध हुई।

इस प्रकार की संगोष्ठियाँ न केवल दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति समाज की सोच को सकारात्मक दिशा देती हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट करती हैं कि समावेशन कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक सामाजिक उत्तरदायित्व है। जब शिक्षा, नीति और संवेदनशीलता एक साथ आती हैं, तभी वास्तविक सशक्तिकरण संभव हो पाता है।
संगोष्ठी ने यह संदेश दिया कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की सीमा नहीं, बल्कि समाज की व्यवस्था की परीक्षा है। यदि अवसर, संसाधन और सहयोग समान रूप से उपलब्ध हों, तो दिव्यांग व्यक्ति भी राष्ट्र निर्माण में सशक्त भूमिका निभा सकते हैं।
इस आयोजन के माध्यम से संस्थान ने यह सिद्ध किया कि शिक्षण संस्थान केवल ज्ञान के केंद्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के सशक्त माध्यम भी होते हैं। भविष्य में भी इस प्रकार के अकादमिक एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यक्रम समाज में समानता, गरिमा और समावेशन की भावना को और अधिक सुदृढ़ करेंगे।

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