Home Kurukshetra News भारत की इकलौती बड़ी “ब्राह्मण रियासत”दरभंगा के 500 साल, अर्श से फर्श तक की कहानी

भारत की इकलौती बड़ी “ब्राह्मण रियासत”दरभंगा के 500 साल, अर्श से फर्श तक की कहानी

by ND HINDUSTAN
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एशिया के सबसे बड़े जमींदारों में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह का नाम रहा

न राजपूत तलवार, न सल्तनत की तोप,इनकी सत्ता की रीढ़ थी विद्या, कानून और अनुशासन

कुरुक्षेत्र से काशी तक, गया से प्रयाग तक दरभंगा राजघराने ने दान पुण्य और निर्माण को खूब बढ़ावा दिया

दरभंगा महाराज के बारे एक बात ख्यात रही कि इन्होंने महलों पर नहीं, धर्मशालाओं पर खूब खर्च किया 

भारत-चीन युद्ध के समय महाराजा कामेश्वर सिंह ने 600 किलो सोना,90एकड़ जमीन राष्ट्र को दी थी दान

महारानी कामसुंदरी जी को कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड 18 जनवरी को देगा श्रद्धांजली  

साभारः राजेश शांडिल्य संपादक विश्व संवाद केंद्र

चंडीगढ़। न राजपूत तलवार, न सल्तनत की तोप,इनकी सत्ता की रीढ़ थी विद्या, कानून और अनुशासन।यहां बात कर रहे हैं एक ऐसी ब्राह्मण रियासत की,जिसके शासकों को दरभंगा महाराज कहा गया। सैकड़ों वर्षों तक दरभंगा रियासत अस्तित्व में रही, जिसने सिद्ध किया ब्राह्मण सिर्फ पुरोहित नहीं,प्रशासक भी हो सकते हैं। जिस दौर में अधिकांश रियासतें क्षत्रिय या मुस्लिम नवाबों की थीं, वहीं दरभंगा अपवाद के रुप में उभरी।दरभंगा शासकों ने केवल तलवार से नहीं,बल्कि अपने कानून से शासन चलाया। मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक इन्होंने कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा,कोई साम्राज्य विस्तार नहीं किया,लेकिन दरभंगा शासक इनके गुलाम भी नहीं रहे।राजस्व, कानून और समझौते में महारथी दरभंगा शासकों ने बल नहीं,बल्कि बुद्धि से सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखा।

दरभंगा राज की स्थापना

दरभंगा राज की स्थापना मैथिल ब्राह्मण परंपरा से शांडिल्य गोत्रीय महेश ठाकुर ने की थी। उनकी विद्वता ने मिथिला को सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। महेश ठाकुर और उनके शिष्य रघुनंदन की विद्या की ख्याति पूरे भारत में फैली। इसी वंश के शासकों ने दरभंगा राज को केवल राजनीतिक सत्ता नहीं, बल्कि मैथिल संस्कृति, धर्म और शिक्षा का संरक्षक बनाया। आगे चलकर महाराजा कामेश्वर सिंह जैसे प्रतापी शासक इसी परंपरा से उभरे, जो आधुनिक भारत में संविधान सभा के सदस्य रहे और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई।

महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह महल नहीं, धर्मशालाओं पर किया धन खर्च
इनके शासनकाल में संस्कृत संग्रहालय की नहीं,बल्कि जीवित भाषा थी। दरबार में संस्कृत में न्याय,शास्त्रार्थ भूमि विवादों के फैसले होते थे।यह दिखावटी संरक्षण नहीं,बल्कि प्रशासन का औजार था।महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह का नाम उस दौर में एशिया के सबसे बड़े जमींदारों में था,लेकिन उन्होंने महल कम और धर्मशालाओं के साथ तीर्थों धर्मस्थलों का विकास ज्यादा कराया।राजसी ठाठ नहीं, ब्राह्मणिक सादगी के लिए इस रियासत का एक दौर में नाम रहा।काशी, गया, प्रयाग और कुरुक्षेत्र जैसे देश के प्रमुख धर्मस्थलों पर दरभंगा शासकों ने काफी काम कराये,लेकिन कोई धार्मिक सत्ता का दावा नहीं किया।

ब्रिटिश राज में उनकी गुलामी नहीं की ना आत्म सम्मान छोड़ा

ब्रिटिश राज के दौरान दरभंगा शासकों का जो उल्लेख मिलता है उसके अनुसार इन्होंने अंग्रेजों से भले टक्कर नहीं ली,लेकिन उनकी गुलामी भी नहीं की और ना ही आत्म सम्मान छोड़ा। भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद दरभंगा भी अन्य रियासतों की तरह भारतीय संघ में विलय हो गया था। 1950 के दशक में जमींदारी उन्मूलन के साथ इसका प्रशासनिक अस्तित्व समाप्त हो गया। बावजूद इसके, मिथिला की बौद्धिक और सांस्कृतिक पहचान पर दरभंगा रियासत की छाप आज भी स्पष्ट है।इसका अतीत यह भीसाबित करता है कि भारत में सत्ता हमेशा तलवार से नहीं, बल्कि विद्या, व्यवस्था और धैर्य से भी चलती है।

दरभंगा रियासत के शासकों द्वारा 19वीं-20वीं सदी में बढ़ चढ़ कर हुए काम
दरभंगा रियासत के शासकों द्वारा 19वीं-20वीं सदी में महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह और महाराज रमेश्वर सिंह द्वारा उत्तर भारत के बड़ेतीर्थों में मिथिला/दरभंगा की धर्मशालाओं का निर्माण व तीर्थों के घाटों की मरम्मत,विस्तार एवं दान पुण्य हुआ था। इनमें कुरुक्षेत्र भीशामिल रहा।दरभंगा रियासत की तरह यह चिह्न मिट गये और शेष बचा वह उल्लेख जिनके माध्यम से पता चलता है कि कभी दरभंगा शासकों ने यह पुनीत कार्य कराये थे।कुरुक्षेत्र इत्यादि तीर्थों के पंडों को नकद दान,भू अनुदान,यज्ञ–अनुष्ठानों के लिये सहायता दरभंगा रियासत द्वारा दी गई।अनेक जगहों पर पंडों की बहियों(वंशावलियों) में उल्लेख के साथ मौखिक परंपरा से इन तथ्यों को आज तक याद किया जाता रहा है।

धर्म, विद्या और प्रशासनिक स्थिरता के लिए जानी गई दरभंगा रियासत

दरभंगा रियासत उत्तर भारत की सबसे समृद्ध और प्रभावशाली देशी रियासतों में से एक थी, जिसका केंद्र मिथिला क्षेत्र (आज का उत्तर बिहार) था। इसका उद्भव मध्यकाल में औइनवार वंश से माना जाता है, जिसे आगे चलकर खंडवाला/दरभंगा राज वंश ने संगठित और शक्तिशाली रूप दिया। यह रियासत किसी साम्राज्यवादी विस्तार के लिए नहीं, बल्कि धर्म, विद्या और प्रशासनिक स्थिरता के लिए जानी गई।

मुगलकाल में मिली थी दरभंगा के राजाओं को मान्यता

मुगल काल में दरभंगा के राजाओं को स्थानीय शासन की मान्यता मिली और ब्रिटिश काल में यह एक प्रमुख जमींदारी रियासत के रूप में उभरी। महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह और महाराज रमेश्वर सिंह इसके सबसे प्रसिद्ध शासक रहे, जिन्होंने आधुनिक प्रशासन, न्याय व्यवस्था और शिक्षा को बढ़ावा दिया। संस्कृत, वेद, न्यायशास्त्र और मिथिला की सांस्कृतिक परंपराओं को उन्होंने खुला संरक्षण दिया। दरभंगा रियासत की पहचान उसकी असाधारण दान-परंपरा थी।काशी, गया, प्रयाग, कुरुक्षेत्र जैसे तीर्थों में धर्मशालाएं, अनुदान और संस्थाएं इसी का परिणाम थीं। हालांकि, इसका प्रभाव धार्मिक-सांस्कृतिक था, राजनीतिक विस्तारवादी नहीं

अंतिम महारानी 96 वर्षीया कामसुंदरी राजमाता कल्याणी देवी के निधन के साथ चर्चा में आई दरभंगा रियासत

भारत को स्वतंत्रता मिलने के कुछ ही साल बाद 1962 का भारत–चीन युद्ध या 1965 का भारत पाक युद्ध इन दोनों आपात स्थिति में जब राष्ट्र बेहद विकट परिस्थितियों में था उस वक्त महाराज कामेश्वर सिंह ने नेशनल डिफेंस फंड और सैनिक कल्याण के लिए बड़ीराशि और सोना एवं आभूषण दान किये थे।भारत के प्रमुख न्यूज चैनल आजतक,एनडीटीवी और अन्य न्यूज चैनलों के अलावा भारत के प्रमुख समाचार पत्रों के अनुसार उस समय महाराज कामेश्वर सिंह ने 600 किलो सोना और 90 एकड़ भूमि व नगदी राष्ट्र के लिए उपरोक्त दोनों युद्ध के समय दान में दिये थे। गत दिवस 12 जनवरी 2026 को इस राजघराने की अंतिम महारानी 96 वर्षीया कामसुंदरी राजमाता कल्याणी देवी का स्वर्गवास हुआ है।उनके अंतिम संस्कार के विवादों के कारण यह राजघराना एक बार फिर चर्चा में है। हरियाणा की सांस्कृतिक राजधानी कुरुक्षेत्र में दरभंगा महारानी को इसलिए श्रद्धांजली दी जाएगी,क्योंकि इस राजपरिवार द्वारा कुरुक्षेत्र तीर्थों पर घाटों की मरम्मत,विस्तार और दानपुण्य के उल्लेख मिलते हैं। वर्तमान में महाभारतकालीन 48 कोस भूमि पर स्थित तीर्थों के जीर्णोद्धार और संरक्षण का जिम्मा संभाल रहे कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मानद सचिव एवं सदस्य एवं सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि दिवंगत महारानी को 18 जनवरी के दिन पवित्र तीर्थ आपगा में श्रद्धांजली देंगे।

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