Home Kurukshetra News प्रेम परमात्म भाव, भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत का मूल आधार-डॉ. बी. डी. कल्ला

प्रेम परमात्म भाव, भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत का मूल आधार-डॉ. बी. डी. कल्ला

by ND HINDUSTAN
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न्यूज डेक्स राजस्थान

जयपुर । प्रेम का जन्म भले ही भौतिक – शारीरिक धरातल पर हो, पर वह सार्थक तब होता है, जब आध्यात्मिक धरातल को प्रभावित करें। प्रेम प्रबंध – अनुबंध – शर्तों और मोलभाव से परे है । वह त्याग और समर्पण की भाषा बोलता है और समझता है। यह उद्गार कला एवं संस्कृति मंत्री डॉक्टर बी. डी. कल्ला ने राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित महाकवि माघ महोत्सव के अंतर्गत कही।

संस्कृत साहित्य में प्रेम तत्व विषयक विशिष्ट व्याख्यान से पूर्व महाकवि माघ को समर्पित डॉक्टर रामदेव साहू द्वारा लिखित माघ प्रशस्ति का लोकार्पण करते हुए डॉक्टर कल्ला ने कहा कि महाकवि माघ को प्रकृति से प्रेम है ,इसलिए उन्होंने प्रकृति का मानवीकरण किया माघ कहते हैं प्रकृति के सारे हावभाव मानो प्रणय के लिए हैं । इसलिए उन्होंने नई पीढ़ी से प्रकृति से प्रेम करने का आह्वान किया।

प्रेम तत्व पर विशिष्ट व्याख्यान के मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के साहित्य के आचार्य प्रोफेसर रमाकांत पांडे ने कहा कि प्रेम का जितना गहरा संबंध श्रृंगार से है, उतना ही भक्ति से है। प्रेम की उन्नत पराकाष्ठा ही भक्ति है। वे कहते हैं प्रेम आसक्ति के बिना हो ही नहीं सकता। इसलिए आसक्ति ही भक्ति है और भक्ति ही आसक्ति है ।

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के निदेशक अर्क नाथ चौधरी ने सारस्वत अतिथि के रूप में बोलते हुए महाकवि माघ द्वारा राजनीति पर गहन एवं महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए हैं। एक कुशल राजा वह होता है, जो शस्त्र की अपेक्षा बुद्धि का प्रयोग करें । प्रकृति – स्वामी मंत्री , मित्र,  कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना को अपना अंग माने और मंत्रणा का कवच बनाए। गुप्तचरों को नेत्र एवं दूत को वाणी बनाकर व्यवहार करें ।
व्याख्यान के विशिष्ट अतिथि महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानेश्वर पुरी ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिशुपाल वध की बहुत टीकाएँ अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुई है। लेकिन जैसे महाकवि टॉलस्टॉय की सुंदरता रशियन में है, महाकवि माघ की सुंदरता संस्कृत में है ।

संस्कृत विभाग की शाशन सचिव शुचि शर्मा ने अपने उद्बोधन का प्रारंभ संस्कृत भाषा में किया। संस्कृत के अनेक उद्धरण दिए और कार्यक्रम को सार्थक बनाया ।  कार्यक्रम की मुख्यातिथि संस्कृत विश्विद्यालय की कुलपति डॉ. अनुला मौर्य ने कहा कि मेघे माघे गतं वयः कालिदास कृत मेघदूत एवं महाकवि माघ को पढ़ने के लिए सारी उम्र भी कम है। माघ महोत्सव भी उनके अनन्य प्रेम को समर्पित है ,ये संस्कृत और संस्कृति का गौरव बढ़ाने वाला है। कार्यक्रम के अंत मे संस्कृत अकादमी की ओर से अतिथियों का माघ स्मृति देकर सम्मान किया गया ।

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