Home Kurukshetra News उत्तराखंडःकांग्रेस बजा रही संवैधानिक संकट की घंटी,भाजपा तीरथ को गंगोत्री के रास्ते ला सकती है सिंहासन तक

उत्तराखंडःकांग्रेस बजा रही संवैधानिक संकट की घंटी,भाजपा तीरथ को गंगोत्री के रास्ते ला सकती है सिंहासन तक

by ND HINDUSTAN
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न्यूज डेक्स उत्तराखंड

देहरादून।कांग्रेस भले उत्तराखंड में संवैधानिक संकट की घंटी बजाकर लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा की दुहाई देकर राष्ट्रपति शासन लगाने की चर्चा कर रही हो,मगर भाजपा बैठे बिठाए इस राज्य की सत्ता के सात महीने बर्बाद नहीं करेगी। भाजपा के थिंकटेंक इसकी पूर्व योजना उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बदलने से पहले तैयार कर चुके थे।

कांग्रेस की तरह भाजपा भी लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151(क) की शक्तियों को जानती है।लिहाजा जब चार साल के कार्यकाल के बाद उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को बदलाकर तीरथ सिंह रावत को कुर्सी पर बिठाया गया था,तब उनके शपथ ग्रहण के समय एक साल से ज्यादा का कार्यकाल शेष था,यानी जिस अधिनियम की दुहाई देकर संवैधानिक संकट का राग अलापा जा रहा है।

योजनाबद्ध तरीके से हुए फेरबदल पर असर नहीं डालेगा। इसी योजनानुसार अगर उत्तराखंड की दो खाली पड़ी विधानसभा सीटों में हल्दवानी या गंगोत्री में से किसी एक पर तीरथ सिंह रावत को उपचुनाव लड़ाया जाता है और वहां वे जीत दर्ज कर अगर 10 सितंबर 2021 तक निर्वाचित विधानसभा सदस्य के रुप में शपथ लेते हैं तो सीएम की कुर्सी उन्हें छोड़नी नहीं पड़ेगी। हालांकि इसके बाद उन्हें पौढ़ी लोकसभा सांसद के पद से त्यागपत्र देना होगा।

इसके बाद यह भी तय है कि पौढ़ी लोकसभा सीट पर भी उपचुनाव कराना लाजिमी होगा। चर्चा इस बात की भी चल रही है कि तीरथ सिंह रावत गंगोत्री से उपचुनाव लड़ सकते हैं। इन सब चर्चाओं और गतिविधियों को दरकिनार कर कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि जिस प्रदेश में आम चुनाव होने में 1 साल से कम का समय शेष हो, वहां पर उपचुनाव नहीं हो सकता और उत्तराखंड में मार्च 2022 में विधानसभा के आम चुनाव होना प्रस्तावित है।

उल्लेखनीय है कि तीरथ सिंह रावत ने 10 मार्च 2021 को उत्तराखंड के सीएम पद की शपथ ली थी। उत्तराखंड में 15 फरवरी 2017 को विधानसभा के आमचुनाव के लिए मतदान हुआ था,जिसके नतीजे 11 मार्च 2017 को घोषित हुए थे,जिसमें भाजपा को बहुमत मिलने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भाजपा के मुख्यमंत्री के रुप में 18 मार्च 2017 को शपथ ली थी।

पूरे परिदृश्य पर अगर नजर डालें तो कांग्रेस जिस अधिनियम की धाऱा का जिक्र कर रही है,उसका अध्ययन भाजपा कुर्सी के फेरबदल से पहले अच्छी तरह से कर चुकी थी। हालांकि जिस दिन तीरथ सिंह रावत को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया गया था,उस दिन वे किसी भी विधानसभा क्षेत्र से विधायक नहीं थी।तब यह माना जा रहा था कि अगले छह माह के अंतराल में उन्हें लोकसभा सांसद पद से इस्तीफा देकर किसी भाजपा सीट को खाल कराकर चुनाव लड़ाया जा सकता है। मगर अप्रैल 2021 जून 2021 में भाजपा और कांग्रेस के दो विधायकों के अकस्मात निधन के कारण यह सीटें खाली हो गई।

इनमें गंगोत्री और हल्दवानी विधानसभा सीटें शामिल हैं। यहां गंगोत्री सीट से भाजपा के विधायक गोपाल रावत की कैंसर से और हल्दवानी से कांग्रेस की कद्दावर नेत्री और नेताप्रतिपक्ष इंदिरा ह्रदयेश का कार्डियेक अरेस्ट से निधन हो गया था। अपने तीन दशक से भी ज्यादा के लंबे राजनीतिक कैरियर में इंदिरा ह्रदयेश की अपने क्षेत्र के साथ साथ उत्तराखंड में मजबूत पकड़ थी।

लिहाजा यहां से भाजपा का कोई बड़ा चेहरा करामात कर दिखाए,फिलहाल इंदिरा ह्रदयेश के सहानुभूति की इस लहर के बीच भाजपा को भी यह संभव दिखाई नहीं दे रहा। वैसे भी 2017 कांग्रेस के विरोधी लहर में भी यह सीट कांग्रेस नेत्री इंदिरा ह्रदेयश की वजह से ही बची थी। वहीं गंत्रोत्री सीट पर पिछले चुनाव में भी भाजपा की झोली में थी और माना जा रहा है कि खुद मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के यहां से चुनाव लड़ने से यहां आसान जीत दर्ज हो सकती है। वैसे यह सब कुछ तब संभव होगा,जब आलाकमान उन्हें दुबारा मौका देने के मूड में होगी।

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