Home haryana सनातन संस्कृति व सभ्यता का प्रतीक है रंगोत्सव का पावन पर्व होली-डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

सनातन संस्कृति व सभ्यता का प्रतीक है रंगोत्सव का पावन पर्व होली-डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

by ND HINDUSTAN
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न्यूज डेक्स संवाददाता

कुरुक्षेत्र। होली एक सौहार्दपूर्ण त्यौहार है। होली का पर्व मात्र परंपरागत उत्सव ही नहीं अपितु जीवन का मनोविज्ञान है, इसका एक सामाजिक दर्शन है। पर्व और त्योहारों की सांस्कृतिक स्वीकृति ही इसलिए है कि समाज का प्रबुद्ध वर्ग इसे समझेगा, समाज को समझाएगा। यह विचार मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने भारतीय संस्कृति के अति पावन पर्व होली के उपलक्ष्य में मिशन के फतहुपुर स्थित आश्रम परिसर में आयोजित रंगोत्सव एवं होली मिलन कार्यक्रम में व्यक्त किए। इस अवसर पर मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा संचालित मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने फूलों की होली खेल जल एवं पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया। 
डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा रंगोत्सव होली का पर्व सनातन संस्कृति व सभ्यता का प्रतीक है।

रंगोत्सव के बेहद पवित्र-पावन पर्व होली में आई विभिन्न प्रकार की विकृतियों को दूर करने के लिए मंथन करके इस समस्या के स्थाई निदान करने के बारे सोचना होगा, लोगों को भारत की प्राचीन सभ्यता व सनातन संस्कृति के अनुसार होली के त्यौहार के वास्तविक अर्थ को समझकर, जनता को वसुधैव कुटुंबकम् की प्राचीन सनातन संस्कृति के मायने समझाकर, दुनिया भर के लोगों को सनातन धर्म को आत्मसात करने के लिए प्रेरित करना होगा, जिससे की भारतीय सनातन संस्कृति व सभ्यता की पताका पूरे विश्वास में गौरव के साथ लहराएं। होली के पर्व पर लोग वर्षों पुरानी दुश्मनी, लड़ाई, झगड़ा भुलाकर एक दूसरे से गले मिल जाते हैं, इसीलिए इस त्यौहार को दोस्ती का भी प्रतीक कहा गया है। इस दिन समाज में कोई ऊंच-नीच नहीं देखता। सभी लोग एक दूसरे को गले लगा कर होली का त्यौहार मनाते हैं। इसे समाज में ऊंच-नीच की खाई कम होती है इसलिए यह त्यौहार सामाजिक महत्व भी रखता है। 

डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा देश में आज युवाओं के बहुत बड़े वर्ग के लिए होली के मायने तेजी से बदलते जा रहे हैं, कुछ लोग आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी प्राचीन संस्कृति व सभ्यता के वास्तविक मायने तेजी से भूलते जा रहे हैं। आज चंद लोगों अपने ही देश में पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण करने के चलते तेजी से बदले हुए परिवेश में होली के पावन पर्व के प्राचीन पूज्यनीय स्वरुप को परिवर्तित करने का कार्य कर रहे हैं। आज के युवाओं के एक बहुत बड़े वर्ग के लिए होली का मतलब संस्कृति सभ्यता व आध्यात्मिक दृष्टि से बिल्कुल भी नहीं है, उनके लिए यह त्यौहार डीजे के तेज शोरगुल में फिल्मु गानों पर नाचकर हुड़दंग मस्ती नशाखोरी करने का छुट्टी में एंजॉय करने का एक दिन मात्र बनता जा रहा है, जो स्थिति देश की भारतीय सनातन संस्कृति के लिए सरासर अनुचित है। 

उन्होंने कहा कि आज समय की मांग है कि यह विचार किया जाए कि देश में व्यवसायिक दौड़ की आपाधापी और भागदौड़ में होली का पावन पर्व भी लोगों के बीच क्यों एक औपचारिकता बनता जा रहा है, इस पर सनातन धर्म के सभी लोग विचार करें। आज देश में कुछ लोगों के लिए दिखावा पसंद बन चुकी महानगरीय संस्कृति के चलते यह त्यौहार भी धन दौलत व ताकत के दिखावे की भेंट चढ़ता जा रहा है, चिंताजनक बात यह हैं कि कुछ लोग तो पावन पर्व होली पर शराब के नशे में चूर होकर घर परिवार व समाज के लिए बड़ी गंभीर समस्या तक उत्पन्न कर लेते हैं। होली जैसे पर्व पर हम सबको अपने जीवन मे सामजिक समरसता का संकल्प लेना चाहिए। कार्यक्रम मे मातृभूमि सेवा मिशन के सदस्य, विद्यार्थी एवं अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे। 

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