न्यूज डेक्स संवाददाता
कुरुक्षेत्र – श्रीकृष्ण संग्रहालय के प्रांगण में श्री राधाकृष्ण कलाक्षेत्र आन्ध्र प्रदेश के कलाकारों द्वारा कुचिपुड़ी नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति ने दर्शकों का मन मोह लिया। डॉ. जीबी नारायण के निर्देशन एवं कलाक्षेत्र की लोक सम्पर्क अधिकारी के नर्मदा कम्पना के नेतृत्व में कलाकारों का यह दल दस राज्यों में अपनी प्रस्तुति देने के पश्चात कल हरियाणा में पहुंचा था। इस दल का लक्ष्य 63 दिनों में सम्पूर्ण भारत में कुचिपुड़ी नृत्य के माध्यम से सनातन संस्कृति के विचारों का प्रचार प्रसार करना है।
रविवार को संग्रहालय के प्रांगण में इस दल को कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मानद सचिव उपेन्द्र सिंघल द्वारा कुरुक्षेत्र विषयक स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उपेन्द्र सिंघल ने कहा कि यह कुरुक्षेत्र का सौभाग्य है कि कुचिपुड़ी के ऐसे उभरते कलाकारों द्वारा इस भूमि पर महाभारत और श्रीकृष्ण पर आधारित प्रस्तुतियां दी गई। आज के कार्यक्रम में कलाकारों द्वारा संग्रहालय में कुल छ: नृत्य प्रस्तुतियां दी गई जिनमें विनायकओथवम, कृष्णशब्दम, श्रीरामपादुका पट्टाभिषेकम, हनुमान चालिसा, कालभैरवाष्टकम् और सूर्याष्टकम् की प्रस्तुतियां सम्मिलित थी। इन प्रस्तुतियों में कुचिपुड़ी के प्रसिद्ध नाट्य कृष्णशब्दम् और श्रीराम के जीवन पर आधारित श्रीरामपादुका पट्टाभिषेकम की प्रस्तुतियों का कलात्मक संयोजन अद्भुद् था जिसकी मुख्य प्रस्तुतियां जी लक्ष्मी दीपिका दी गई। अन्य प्रस्तुतियों में उनके साथ बी श्रुति, ज्योति तथा मोनिका ने सामूहिक नृत्य के माध्यम से दर्शकों को भक्तिभाव से भर दिया।
संग्रहालय के कॉर्डिनेटर राजेन्द्र सिंह राणा एवं संग्रहालय प्रभारी बलवान सिंह ने कलाकारों का श्रीकृष्ण संग्रहालय में स्वागत किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध समाजसेवी श्री जयभगवान सिंघला द्वारा कलाकारों के दल को प्रेरणा संस्था की ओर से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर प्रसिद्ध प्रो. आईसी मित्तल, हरि सिंह, एडवोकेट जय प्रकाश शर्मा सहित कईं गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। सभी ने इस कार्यक्रम की सराहना की तथा बाहर से आए हुए कईं दर्शकों ने कहा कि आज कुरुक्षेत्र की भूमि में दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परम्पराओं को इस प्रकार सजीव रुप से देखना उनके जीवन का अविस्मरणीय क्षण है। दर्शकों ने कहा कि श्रीकृष्ण संग्रहालय के प्रंागण में भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के लीला चरित्र का गायन एवं भावभंगिमाओं से भरपूर इस नृत्य ने सनातन संस्कृति को जीवन्त करके रख दिया है।