मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने विक्रमी संवत 2082 के प्रथम सूर्योदय की किरणों का स्वागत एवं अभिनन्दन
वैदिक मंत्रोच्चारण एवं शंख ध्वनि से जलाभिषेक करते हुए सर्व मंगल की प्रार्थना से किया
एनडी हिन्दुस्तान
कुरुक्षेत्र । प्राचीन भारतीय कालगणना आधारित विक्रम संवत विश्व का वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित प्रथम पंचांग है। शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्माजी ने इस दिन सम्पूर्ण सृष्टि और लोकों का सृजन किया था और इसी दिन भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार भी हुआ था। भारत में विक्रमी संवत, जिसे उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने 56 ईसा पूर्व शुरू किया, जो चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से शुरू होता है। इसे सभी सनातन धर्म के मानने वाले नव वर्ष के रूप में मनाते हैं।इसी दिन से नया पंचांग शुरू होता है। यह विचार नव संवत्सर 2082 के शुभारम्भ एवं अभिनन्दन उपलक्ष्य पर ब्रह्मसरोवर पर मातृभूमि सेवा मिशन के तत्वावधान में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने व्यक्त किये। कार्यक्रम का शुभारम्भ ब्रह्मसरोवर तीर्थ के पूजन से हुआ। मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने विक्रमी संवत 2082 के प्रथम सूर्योदय की किरणों का स्वागत एवं अभिनन्दन वैदिक मंत्रोच्चारण एवं शंख ध्वनि से जलाभिषेक करते हुए सर्व मंगल की प्रार्थना से किया।
मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने नव संवत्सर का महत्व बताते हुए कहा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य द्वारा प्रवर्तित विक्रम संवत ही हमारा राष्ट्रीय संवत है। यह सर्वथा शुद्ध और वैज्ञानिक है। यह हमारी अस्मिता और स्वाधीनता के निरीक्षण तथा शत्रुओं पर विजय का प्रतीक भी है।चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, हिंदुओं के नव वर्ष का आरंभ दिन है। इसी दिन सृष्टि की निर्मिति हुई थी, इसलिए यह केवल हिंदुओं का ही नहीं अपितु अखिल सृष्टि का नव वर्षारंभ है। भगवान राम और युधिष्ठिर का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था। इसी दिन प्रकृति भी हमें बदलाव के संकेत वृक्षों पर पतझड़ के बाद नए पत्ते आने के साथ देती है, चारों तरफ अनेक प्रकार के फूल खिलते हैं, ऐसा लगता है मानो हरियाली भी नव वर्ष मना रही है। फसल पकने के बाद नया अनाज बाजार में आता है। शक्ति और भक्ति के प्रतीक नवरात्रि इसी दिन से प्रारंभ होते हैं। सम्पूर्ण वातावरण आनंदमय और आध्यात्मिक प्रतीत होता है।
डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा सनातन नववर्ष उल्लास, उमंग और उत्सव का परिचायक है। आज आवश्यकता है कि हम वर्तमान पीढ़ी को भारतीय सनातन संस्कृति से परिचित कराकर गौरव की अनुभूति कराएं जो पश्चिम की उपभोक्ताओंवादी संस्कृति का आलिंगन किये हुए है। सनातन वैदिक जीवन मूल्यों को आत्मसात करके ही भारत पुनः संसार में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है। कार्यक्रम का समापन ब्रह्मसरोवर तीर्थ की आरती से हुआ। कार्यक्रम में विक्रमी संवत 2082 के शुभारम्भ के उपलक्ष्य में मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा आयोजित द्विदिवसीय कार्यक्रम की पूर्णाहुति भी संपन्न हुई। कार्यक्रम में आचार्य सतीश कौशिक, आचार्य नरेश, सुरेंद्र सिंह, धर्मपाल सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे।