फिरंगियों की इसी भूल का अहसास कराया था शहीद ए आजम सरदार उधम सिंह ने
जालियांवाला बाग नरसंहार के जिम्मेदार को मौत के घाट उतरने लिए किया 21 साल इंतजार
….और लंदन में जाकर ढेर किया माइकल ओ डायर
अनाथालय में नाम मिला था शेर सिंह
नियति ने उसे तो यथावत रखा,आगे उसमें उधम भी जोड़ा
साभारःविश्व संवाद केंद्र,विमर्श और ट्रू मीडिया में प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार राजेश शांडिल्य का लेख
एनडी हिंदुस्तान
चंडीगढ़। सोने की चिड़िया….बाहरी आततायी ताकतों ने सदियों से भारत को यही समझने की भूल की। इतिहास भरा पड़ा है,क्योंकि हर कालखंड में कुत्सित पंजों पर भारत का सिंहनाद भारी पड़ा।हां, अपने ही भेदियों के बुने जाल से शिकंजे में फंसे रहने की अवधि जरूर कम ज्यादा हुई। फिरंगियों को ऐसी ही एक सिंह गर्जना का भान शहीद ए आजम सरदार उधम सिंह ने 13 मार्च 1940 को कराया था। आज उनका बलिदान दिवस है।ऐसे राष्ट्रभक्तों के प्रयासों से हम स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं। इनके प्रति अथाह सम्मान रखने वाले भारतीय स्वयं को गौरवांवित समझते हैं कि उनका संबंध उसी पावन भूमि से है,जहां वीर सपूत उधम सिंह का जन्म हुआ। लक्ष्य प्राप्ति से उन्होंने अपने नाम को साकार करके दिखाया।भारत के इस सिंह ने जो संकल्प लिया था, उसकी सिद्धि जालियांवाला बाग नरसंहार के जिम्मेदार माइकल ओ डायर के वध से की। डायर को लंदन जाकर मारा। फिरंगी साम्राज्य लंदन को वर्ल्ड कैपिटल के रुप में स्थापित कर चुका था।वर्तमान और भावी पीढ़ी भी संकल्प सिद्धि के लिए किये गए इस उधम और फिरंगियों के देश जाकर भारत की सिंह गर्जना पर गौरवांवित होंगे।
भारत के महापुरुष सरदार उधम सिंह का जीवन एक कड़े संघर्ष की गाथा
शहीद ए आजम सरदार उधम सिंह का जन्म पंजाब प्रांत के सिख कंबोज परिवार में हुआ था। सन 1901 में उधमसिंह की माता और1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनीपड़ी।
अनाथालय में शेर सिंह को नया नाम मिला उधम सिंह
उधमसिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था। अनाथालय में क्रमश: उधमसिंह और साधुसिंह के रूपमें नए नाम मिले। हालांकि उनके भाई साधु सिंह का निधन बचपन में हो गया था। माता-पिता और भाई को खोने के बाद वे जालियांवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी भी रहे।
जालियांवाला बाग की घटना और उधम सिंह का संकल्प
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उधमसिंह 13 अप्रैल 1919 को उसी जालियांवाला बाग में मौजूद थे,जब वहां नरसंहार हुआ था। इस घटनाक्रम के बाद 1919 मेंउन्होंने अनाथालय छोड़ा और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ चल रही गतिविधियों में शामिल हो गए। उन्होंने तब जालियांवाला बाग की मिट्टी को हाथ में लेकर पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ डायर का वध करने का संकल्प लिया और सब जानते है कि इस घटना के 21 वर्ष बाद इस संकल्प को पूरा भी किया,लेकिन इससे पहले…
इंग्लैंड गमन,भगत सिंह के निमंत्रण पर वापिसी और 4 साल की कैद
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सरदार उधम सिंह जालियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने की ठान अगले ही साल 1920 में दक्षिण अफ्रीका से अमेरिका और फिर इंग्लैंड पहुंचे थे। 1928 में सरदार भगत सिंह के निमंत्रण पर वे वापिस भारत आए। यहां लाहौर पहुंचते ही आयुद्ध अधिनियम केतहत उन्हें गिरफ्तार कर चार वर्ष के लिए सश्रम काल कोठरी में भेजने की सजा सुनाई गई। इस दौरान सरदार उधम सिंह के लिए वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन भी आया,क्योंकि जिन भगत सिंह के बुलावे पर वह भारत आए थे,अंग्रेजों ने भारत के उस क्रांतिकारी भगत सिंह और उसके साथी सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी थी। अंग्रेजों की इस करतूत से पूरे देश में बवाल मचा था।जाहिर है इस घटना से उधम सिंह का भी खून खोला होगा और भगत सिंह की फांसी के एक साल बाद यानी 1932 में उधम सिंह जेल से छूटे तो सबसे पहले उन्होंनेराम मोहम्मद सिंह आजाद के नाम से अमृतसर में दुकान खोली।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और वीर सावरकर जैसे क्रांतिकारियों से संबंध
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इस दुकान खोलने के पीछे उनका मकसद छुपा हुआ था। उधम सिंह ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस और वीर सावरकर जैसे क्रांतिकारियोंसे संबंध भी स्थापित किए। हालांकि पूरी गहनता से इनकी मुलाकातों के दौर की जानकारी इसलिए नहीं मिलती, क्योंकि यह सब कुछ काफी गोपनीय ढंग किया जा रहा था। बताया जाता है कि नेताजी की योजना पर काम करते हुए ही उद्यम सिंह 1933 में जर्मनी पहुंचे थे। इसके बाद उनका अगला पड़ाव था इंगलैंड।
दुबारा इंग्लैंड पहुंच कर तैयारी और माइकल ओ डायर का वध
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सरदार उधम सिंह दुबारा इंग्लैंड पहुंचे तो उन्होंने माइकल ओ डायर के वध की पूरी तैयारी की। उन्होंने 13 मार्च 1940 को फ्रेंकब्राजील नामक वर्दीधारी सैनिक का रूप धरा और इसके बाद पहुंचे रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी लंदन के काक्सटन हाल में । यहांपंजाब के पूर्व गवर्नर माईकल ओ डायर भी आमंत्रित थे। इस दौरान उनके हाथों में एक पुस्तक भी थी।इसी पुस्तक में उन्होंने एक खास तरकीब के साथ अपनी पिस्टल को छुपाया हुआ था। आयोजन स्थल के आसपास सुरक्षा व्यवस्था में मुस्तैद गार्ड को इसकी भनक तक नहीं लगी कि जो व्यक्ति हाथों में पुस्तक लेकर गुजर रहा है,उस पुस्तक के भीतर कटे हुए पन्नों में पिस्टल जैसा घातक हथियार भी हो सकता है।यहां तक अपने मिशन में उधम सिंह सफल हो चुके थे।
माइकल ओ डायर के भाषण के बाद चली थी गोलियां
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माइकल ओ डायर ने जब भारतीयों के विरुद्ध जहर उगलना शुरू किया तो उद्यम सिंह ने पिस्तौल से उस पर 6 गोलियां दागी। उसे दोगोलियां लगी और वह वही ढेर हो गया। इस दौरान लूई डेन, लार्ड लैमिंगटन और लार्ड जेटलैंड जख्मी हो गए थे। उद्यम सिंह के पास25 गोलियां और थी। वह चाहते तो भाग सकते थे, किंतु लक्ष्यपूर्ति के बाद उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दी। देश के कुछ बड़े नेताओं नेजहां इसे पागलपन कहा था,वहीं वीर सावरकर ने इसे सरदार उधम सिंह का वीरतापूर्ण कार्य बताया था। भारत मां के इस सच्चे सपूतको 31 जुलाई 1940 को फांसी दी गई थी।
19 जुलाई 1974 को लंदन से भारत लायी गई थी अस्थियां
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ब्रिटिश कोर्ट में उनके ऊपर केस चला और 4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 कोपेंटनविले जेल में उन्होंने हंसते हंसते फांसी का फंदा चूमा। उनका अस्थि पात्र 19 जुलाई 1974 को लंदन से दिल्ली लाया गया था। तब इनमें से कुछ अस्थियां सतलुज नदी में प्रवाहित की गई थी। कुछ अस्थियां जालियांवाला बाग में आज भी सुरक्षित रखी हैं