Home Kurukshetra News हरियाणा के रंगकर्मियों ने लखनऊ में दिखाई अभिनय प्रतिभा, तीन नाटकों का हुआ मंचन

हरियाणा के रंगकर्मियों ने लखनऊ में दिखाई अभिनय प्रतिभा, तीन नाटकों का हुआ मंचन

by ND HINDUSTAN
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लखनऊ में मंचित हुए हरियाणा के तीन नाटक, रब राखा, नपुंसक और राम सजीवन की प्रेम कथा ने दर्शकों का मन मोहा

एनडी हिन्दुस्तान

कुरुक्षेत्र । हरियाणा कला परिषद द्वारा समय-समय पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर प्रदेश के कलाकारों को मंच प्रदान किया जाता है। इसी कड़ी में हरियाणा कला परिषद द्वारा चण्डीगढ़ विश्वविद्यालय के सहयोग से लखनऊ में तीन दिवसीय दर्पण नाट्य उत्सव का आयोजन किया गया। जिसमें हरियाणा के तीन नाट्य दलों मीरा कल्चर सोसायटी, भिवानी, प्रयास रंगमंच, कैथल तथा मसखरे रंगमच, अम्बाला के कलाकारों को लखनऊ में अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। सांस्कृतिक आदान-प्रदान श्रृंखला के अंतर्गत हरियाणा कला परिषद द्वारा देश के विभिन्न राज्यों में सांस्कृतिक आयोजन करवाए जाते रहे हैं। इसी कड़ी में चण्डीगढ़ विश्वविद्यालय की लखनऊ शाखा में आयोजित दर्पण उत्सव में पहले दिन हरियाणा के नाट्यकर्मी डा. महिपाल पठानियां द्वारा नाटक रब राक्खा मंचित किया गया। पंजाबी विश्वविद्यालय से रंगमंच की पढ़ाई करने उपरांत लोक रंगमंच में पीएचडी करने वाले डा. महिपाल पठानिया हरियाणा के रंगमंच में अपनी एक खास पहचान रखते हैं। पठानिया के निर्देशन में उत्सव के पहले दिन भारत-पाक बंटवारे पर आधारित नाटक रब रक्खा के माध्यम से कैथल के कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। नाट्य उत्सव के दूसरे दिन मसखरे रंगमंच अम्बाला द्वारा नाटक नपूंसक का मंचन किया गया। किन्नर समाज की व्यथा को व्यक्त करते नाटक में निर्देशन तथा अभिनय हरियाणा कला परिषद के निदेशक तथा अंर्तराष्ट्रीय स्तर के कलाकार नागेंद्र शर्मा द्वारा किया गया। किन्नर समाज की पीड़ा को दर्शाते नाटक नपुंसक में एक ऐसे व्यक्ति की कहानी को दिखाया गया, जो अपने बाल्यकाल में होनहार होता है। लेकिन बचपन में ही उसके परिवार में उसके पिता के द्वारा उसे प्यार नहीं मिलता। परिवार वालों से ही प्यार की अपेक्षा दुत्कार मिलना उस बच्चे के मन में एक टीस पैदा कर देता है। एक दिन एक चमेली नाम की मंगलमुखी उसे अपने साथ में ले जाती हैं। अनजान लोगों के बीच एक अलग सी दुनिया में उस बच्चे को अलग से रहना पड़ता है। बहुत सारे कड़वे अनुभवों से गुजरते हुए उसका जीवन बीतता है। जब वह बड़ा हो जाता है तो उसे एक लड़की से प्यार हो जाता है लेकिन वह अपना पुरुषत्व साबित नहीं कर सकता। एक दिन लड़की भी उसे छोड़ कर चली जाती है और नाम दे जाती है कि तुम नपुंसक हो। धीरे.धीरे वह अपनी इस पहचान को स्वीकार करते हुए अपने उसी जीवन में ढल जाता है। लेकिन कहीं न कहीं समाज के लिए एक सवाल खड़ा कर जाता है कि नपुंसक वह है या समाज। वह समाज को अपना रहा है लेकिन समाज उसे अपनाने को तैयार नहीं है। लोग अपनी मानसिक संकीर्णताओं के कारण समाज को बांटने का प्रयास करते रहते हैं। फिर चाहे वो धार्मिक पहलू हों, आर्थिक पहलू या फिर धर्म के नाम पर सामाजिक अव्यवस्था। नाटक के जरिए यह संदेश दिया गया कि किन्नर समाज के लोग भी आम जीवन जीना चाहते हैं, समाज का अंग बनकर रहना चाहते हैं। समाज का अगर प्यार मिले तो वो भी समाज का अंग बन कर रह सकते हैं। इस तरह से एक अच्छे संदेश के साथ नाटक नपुंसक ने समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया। उत्सव का तीसरा दिन भिवानी के कलाकारों द्वारा अभिनीत नाटक राम सजीवन की प्रेम कथा के नाम रहा। नाटक का निर्देशन रंगकर्मी सोनू रोंझिया ने किया।

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