इंग्लैंड ने माना सरस्वती का अस्तित्व, हरियाणा में 15 हजार वर्ष पहले बहती थी जलधारा
महत्वपूर्ण भूमिका, प्रोफेसर डा. एआर चौधरी के रिसर्च पेपर को इंग्लैंड के जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल प्रोस्पेक्शन ने किया प्रकाशित
सरस्वती के मिथ्या को तोडऩे के लिए पांच साल में आदिब्रदी से लेकर भारत-पाक सीमा अनूपगढ़ तक जुटाए तथ्य
न्यूज डेक्स संवाददाता
कुरुक्षेत्र। सरस्वती मिथक नहीं बल्कि आस्था को सिंचित करने वाली वास्तविकता है। हरियाणा के भू-भाग पर 15 हजार साल पहले सरस्वती की अविरल जलधारा बहती थी। वैज्ञानिक तथ्य भी इस बात की पुष्टि करते है कि सरस्वती नदी का अपना अनूठा और व्यापक अस्तित्व रहा है। यह खुद इंग्लैंड ने भी माना है। धर्मनगरी कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी पर बाकायदा अंग्रेजों द्वारा पुल का निर्माण किया गया है। अब इंग्लैंड के जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल प्रोस्पेक्शन ने सरस्वती शोध पर सेंटर आफ एक्सीलेंस फॉर रिसर्च ऑन द सरस्वती के निदेशक डा. एआर चौधरी के रिसर्च पेपर को प्रकाशित किया है। इस रिसर्च पेपर के माध्यम से उन्होंने सरस्वती नदी के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक साक्ष्य को साबित किया है।
हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमच ने बातचीत करते हुए कहा कि अभी तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरस्वती के अस्तित्व मिथ्या बताया जा रहा था। सरस्वती के अस्तित्व को लेकर विदेशी वैज्ञानिकों ने शोध पत्रों के जरिये भ्रम फैलाया कि पौराणिक हड़प्पा सभ्यता अवशेषों की सरस्वती नदी से दूरी 50 से 60 किलोमीटर है। मगर डा. एआर चौधरी में शोध में यह साबित किया है कि हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों की सरस्वती नदी समूह से दूरी महज 500 मीटर से भी कम है। विदेशी वैज्ञानिकों के भ्रम को तोडऩे के लिए प्रोफेसर चौधरी ने आदिबद्री से लेकर भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित राजस्थान जिले के अनूपगढ़ तक गहन शोध किया और अहम तथ्य जुटाए। यही नहीं कुरुक्षेत्र में बने सरस्वती पुल के नीचे से पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि यहां से 14 हजार साल पहले नदी प्रवाहित होती थी।
उन्होंने शोध में यह साबित किया है कि सरस्वती नदी का अपना अनूठा और व्यापक अस्तित्व रहा है, इस तथ्य को इंग्लैंड के जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल प्रोस्पेक्शन ने प्रमाणित किया है। उन्होंने कहा कि शोध से यह भी सत्यापित किया गया है कि देश की प्राचीन सभ्यता के विकास में सरस्वती नदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हरियाणा में सरस्वती नदी हड़प्पा सभ्यता का विकास 6500 वर्ष इसा पूर्व से लेकर 15वीं शताब्दी के आरंभ तक रही थी। यह तथ्य भी सामने आया है कि उत्तर भारत में मानव सभ्यता के विकास में नदी के प्रवाह को लेकर कभी कोई अड़चन नहीं आई।
सरस्वती के अस्तित्व को जानने के लिए प्रोफेसर डा. एआर चौधरी ने नदी के भूतकालीन प्रवाह मार्ग को सेटलाइट फोटो के जरिये चिह्नित किया। इसके बाद इस प्रवाह मार्ग पर कई जगह गहरे गड्डे खुदवाए गए और उनके सैंपल की कार्बन 14 डेटिंग और ओएसएल डेटिंग करवाई गई। इस कार्य में इंटर यूनिवर्सिटी एक्सेलरेटर सेंटर नई दिल्ली एवं वडिआ इंस्टिच्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी की लैब में टेस्टिंग का कार्य किया गया। सेडीमेंट्स का रिसर्च कार्य कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फार रिसर्च आन डी सरस्वती रिवर में किया गया।
उन्होंने कहा कि ओएसएल डेटिंग और एक्सलेरेटर मास्स स्पेक्ट्रोस्कोपी बेस्ड कार्बन 14 डेटिंग के लिए 270 सैंपल में से दो दर्जन सैंपल का चयन किया गया। इस शोध में यह प्रमाणित हुआ कि सरस्वती नदी 15 हजार बरस पहले हरियाणा में प्रवाहित होती रही है। यह भी बात साबित हुई कि सरस्वती अविरल रूप में 1402 ईस्वी तक प्रवाहित होती रही। सरस्वती नदी के ऐतिहासिक व पौराणिक साक्ष्य मिल रहे हैं। वेदों-पुराणों में सरस्वती का उल्लेख है। चीनी यात्री हूनस्यांग सहित कनिंग 1880 में कनिंगम, बिट्रिश आर्कियोलॉजिकल आफ इंडिया ने माना है कि सरस्वती यहां बहती थी, इस बात का उल्लेख भी किया गया है। अभी हाल ही में पिहोवा के पास सरस्वती तट के पास संगम तीर्थ को खोजा गया है।
जल्द ही इस स्थान को हेरिटेज सेंटर के रूप में विकसित किया जाएगा। शोधकर्ता डा. एआर चौधरी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह साबित किया गया कि सरस्वती नदी एक मिथ्या है, लेकिन सच्चाई यह है कि सरस्वती नदी भारतीय सभ्यता का पालन-पोषण करती है। अब तक वैज्ञानिकों का यह मत था कि 500 वर्ष पूर्व नदी सूख गई थी। मगर शोध पत्र में यह प्रमाणित हुआ है कि हरियाणा के भू-भाग पर नदी का प्रवाह 14 हजार वर्ष या इससे पहले तक रहा। यही नहीं नदी का जलस्तर इतना अधिक था कि इसके फ्लड लैन की औसत चौड़ाई 1.5 किलोमीटर से 13 किलोमीटर तक पाई है। सरस्वती नदी और वैदिक काल की सहायक नदियां दृष्टद्वती, अपया, चौतंग का व्यापक जाल पूरे हरियाणा में 2984 किलोमीटर लंबा था।