चौखट और किवाड़ की कहानी डा.महा सिंह पुनिया की जुबानी
न्यूज डेक्स हरियाणा
मैं घर के जीवन मूल्यों, संस्कारों एवं संस्कृति का सजग प्रहरी हूं। मैं घर का आईना हूं, जब मैं बंद होता हूं तो पूरा घर सुरक्षित होता है। मैं जब खुलता हूं तो घर में खुलेपन का अहसास होता है क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मैं जब आधा खुलता हूं तो अनेक रहस्यों को अपने अन्दर समाया हुआ रहता हंू। आयताकार घर की चौखट मुझे आश्रय प्रदान करती है। मेरे पर लगी हुई सांकल सुरक्षा एवं आहट का अहसास करवाती है, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
मेरे ऊपर बने हुए फूल, पत्ती, डिजाईन घर की समृद्धि के परिचायक होते हैं। मेरा आकार, प्रकार, स्वरूप सभी ब्योंत के अनुसार होते हैं। मैं सबके घर के ब्योंत का परिचायक हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मेरे दाएं-बाएं चौखट के दोनों ओर बने आले-दीवाले घी व सरसों के तेल के दीयों से चिन्हित कालस लोक परम्पराओं की साक्षी हैं, मैं उन परम्पराओं को अगली पीढ़ी तक ले जाने का सहायक हूं, क्योंंकि मैं किवाड़ हूं…
मैं गली से गुजरने वाली हर राहगीर के मन के भावों को जानता हंू, मेरे सिर पर लक्ष्मी एवं गणेश को स्थापित करने की परम्परा है। मैं सदियों पुरानी परम्परा का परिचायक हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मुझे पाट, कपाट, झांप, झिलमिली, दरवाजा, द्वारपट, द्वारकपाट, किवाड़ आदि अनेकों नामों से जाना जाता है। घर बनने पर चौखट में तोता बंधाई मेरे आगमन का शुभ संकेत है। विवाह के मौके पर दूल्हे द्वारा त्योरण को छूने की परम्परा का मैं साक्षी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
घर में घुसने से पहले सभी सदस्य मुझे छूते हैं। उनके छूने के भाव से मैं उनकी दिल की आह्ट को जान लेता हूं। उनके मन के भावों को मैं पढ़ लेता हूं, फिर भी मैं कुछ नहीं कहता, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… बाहरी व्यक्ति घर में प्रवेश करने से पहल मेरे ऊपर लगी सांकल को खटखटाता है। उसके सांकल खटखटाने के ढंग से मैं उसके मन के रहस्यों को पढ़ लेता हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
मेरे ऊपर लगी लोहे एवं पीत्तल की सांकल से निकलती आवाज घर के सदस्यों को किसी के आने की आह्ट का संदेश देती है। घर के सदस्य सभी काम-काज छोडक़र मेरी ओर दौड़े चले आते हैं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… रात के समय बंद होने पर मैं घरवालों में सुरक्षा का भाव जगाता हूं, मेरी ही बदौलत परिवार के सदस्य लंबे पैर पसारकर चैन की नींद सोते हैं, मैं उनकी सुरक्षा का सजग प्रहरी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
मेरे ही बीच में दादी-नानी की चारपाई बिछती है, उसी चारपाई पर दादी और नानी जो कहानी-किस्से बच्चों को सुनाती हैं मैं उन संस्कारों के हस्तांतरण का साक्षी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… घर में छठी के दिन रतजगे का उत्सव मेरे सामने ही होता है, गोबर की बेमाता बनाकर मेरे ही आजू-बाजू बुहारी की सींक व लाल कपड़ा टांगा जाता है, मैं घर के सभी संस्कारों का आधार हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
दीवाली के दिन लक्ष्मी के रूप में बिल्ली के आने का रास्ता मेरे खुलने से तय होता है, तीज-त्योहारों पर मेरी ही चौखट पर घी तथा सरसों के तेल के दीये जलते हैं, मैं सभी तीज-त्योहारों का मौन दर्शक हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मेरी ही चौखट पर आकर भिखारी को भीख दी जाती है, पुण्य का दान दिया जाता है, मैं दोनों ही प्रवृतियों का साक्षात् साक्षी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
विवाह के अवसर पर भातियों को मणने के लिए मेरी ही चौखट पर बहन अपने भाईयों के लिए- मेरा चूंडा फडक़ै री के भात्ती आवैंगे गीत गाती हैं, मुझे छूकर ही सभी भात्ती बड़ा लड्डू लेकर घर में प्रवेश करते हैं, मैं बहन और भाई के इस प्यार का सजग साक्षी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…मेरी भी जोड़ी होती है, उसका एक पल्ला पुरुष तथा एक पल्ला स्त्री कहलाता है। मेरे दोनों पल्ले मिलने के पश्चात ही घर में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। मेरे दोनों पल्ले घर में बीर-मर्द का परिचायक हैं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
मेरे पास ही देहली पर बैठकर घर के छोटे बच्चे जीवन के सपनों का ताना-बाना बुनते हैं, तुतलाती हुई आवाज में खूब अटखेलियां करते हैं, मैं उनकी तुतलाती आवाज में बुनते हुए सपनों का साक्षी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मैं घर में प्रवेश करने से पहले आह्ट मात्र से व्यक्ति के भावों को पढ़ लेता हूं, घर में मेहमानों का सबसे पहले मैं ही स्वागत करता हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मैं घर के बुजुर्गों का सहारा भी हूं। देहली पार करते समय मैं उनको आलंबन प्रदान करता हूं। मैंने उनके जीवन के अनेक उतार-चढ़ावों को मेरे पास से गुजरते हुए देखा है, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
इतना ही नहीं, घर में नई वधु के आने पर बहन भाई से बार रूकाई का नेग मेरे ही दम पर लेती है। घर में नई-नवेली दुल्हन का परिवार के नवीन सदस्य के रूप में सबसे पहले मैं ही तो स्वागत करता हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… घर में महिलाओं की लाज की परम्परा का मैं सजग प्रहरी हूं। घर की बहूएं मेरा आश्रय लेकर ही गली में होने वाली घटनाओं को एक आंख से देखती हैं। मेरी ओट से ही घर में नई-नवेली दुल्हन अर्धशरमाई सी रहती है, मैं लाज एवं स्वच्छंदता के बीच के भावों का साक्षी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
मेरे दो पल्ले जब आपस में मिलते हैं तो घर सुरक्षित महसूस करता है। मेरे दोनों पल्लों के पीछे लगा हुआ मूसला मुझे रात को मजबूती प्रदान करता है। मैं आगे से बहुत सुंदर लगता हूं। मेरे पिछले हिस्से में लोहे तथा पीत्तल की कीलें मेरी मजबूती का परिचायक हैं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… घर में जब भी कोई संकट होता है तो भागकर लोग मुझे ही बंद करते हैं, मैं घर में घटने वाली हर अच्छी तथा बुरी घटना का गवाह हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
घर में लगे झरोखे, खिड़कियां मेरे ही वंश की परिचायक हैं। मेरे से ही खुलने एवं बंद होने का संस्कार उनमें समाहित है। मैं घर में आने वाली हर तरह की आबोहवा का साक्षी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… घर में पुत्र जन्म, विवाह, काज, तीज-त्योहार, उत्सव आदि अवसरों पर मुझे नहलाया जाता है, पोता जाता है, मेरे ऊपर सरसों का तेल एवं घी लगाकर चमकाया जाता है, मैं घर के आदमियों की उत्सवी भावनाओं का परिचायक हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
घर से बाहर घूंघट रखने वाली बहूएं मेरी चौखट पर आकर स्वच्छंदता का आभास करती हैं। मैं घर की सभी महिलाओं की स्वतंत्रता के आभास का परिचायक हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… घर में मेरी से जुड़ी हुई अनेक परम्पराएं हैं, विवाह के अवसर पर दुल्हन के घर में प्रवेश से पहले गोर गढी गोर गढी बन्ना छोटा बहू बड़ी, सास द्वारा रस्सी से बने नेत्ते से बहू की लम्बाई नापने का साक्षी भी मैं ही हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
दहेज के नाम पर, समाज में झूठी शान बढ़ाने के नाम पर, विवाह में घर की चौखट से बड़ा संदूक देने तथा उस संदूक के घर में प्रवेश करने के लिए मुझे उतारने और फिर से स्थापित करने सामाजिक चर्चाओं का मैं आधार हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…मेरे एक पल्ले की आड़ में घर की महिलाएं सुबह से शाम तक अनेकों सवालों का जवाब देती हैं, सामाजिक बंधनों के चलते मैं उनके भावों को शारीरिक स्वरूप में छिपाने हेतु उन्हें आश्रय प्रदान करता हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
मेरे घर के किसी सदस्य पर जब काली नजर लगती है तो वह नजर उतारकर मेरी ही चौखट पर ज्योत लगाई जाती है। घर में घटित होने वाले लोक विश्वासों एवं रूढि़वादियों का मैं पारम्परिक प्रहरी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… घर में बच्चा होने पर मेरे ऊपरी हिस्से में नीम के पत्तों की टहनी टांगी जाती है। घर में शुभ कार्य पर मेरे ऊपरी हिस्से मेें आम के पत्तों की बन्दनवार लगाई जाती है। उस बंदनवार की परम्पराओं का प्रत्यक्षदर्शी मैं ही हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
घर में शुभ कार्य पर मेरे ही दोनों ओर चौखट पर सतिया, हाथ का चित्तण, ब्याह का न्यौता बनाया जाता है, मैं इन्हीं लोककलात्मक इन परम्पराओं का रखवाला हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मेरी चौखट के दोनों ओर बने मेहराब सांस्कृतिक परम्पराओं के परिचायक हैं। मेरे दाएं-बाएं व ऊपर लकड़ी में की गई नक्काशी आंचलिक संस्कृति की द्योतक है। दशाही की चौखट पर मैं खूब सुंदर लगता हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
मैं घर, दहलीज, घेर, बगड़, बैठक, किले, कोठी सभी के मुख द्वार पर जड़ा हुआ होता हूं। मैं लोक पारम्परिक वास्तुकला एवं सांस्कृतिक परम्पराओं का साक्षी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मैं काठ के मोटे बने भारी तख्तों से बना होता हूं। मेरी लकड़ी की मजबूती घर की मजबूती की परिचायक है, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मैं लकड़ी के साथ-साथ लोहे, पीत्तल, सोने, चांदी सभी धातुओं का अंगीकार हूं। मेरे दोनों ओर बनी लकड़ी तथा पत्थर की चौखट को मैं ही सुंदरता प्रदान करता हूं।
मेरे बिना घर की चौखट एवं मैं घर की चौखट के बिना अधूरा हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… किलों में मेरे पल्ले बड़े हो हैं, मेरे सीने में भाले लगे होते हैं, मैं उन भालों के घावों को सहन करता हुआ किले की रक्षा करता हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं। मेरा उतरना-चढऩा, मुझे लूट कर ले जाना अनेकों राजे-रजवाड़ों के स्वाभिमान का मैं साक्षी भी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मेरा रूप, आकार, प्रकार, स्वरूप सबकुछ आंचलिकता का हिस्सा है। मैं अपने अन्दर आंचलिक संस्कृति को समाहित किए हुए हूं।
मैं मेरे को बनाने वाले कलाकारों की कला को विकसित होने का खूब अवसर प्रदान करता हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…मैं सदियों से लोहार, सुनार, बढ़ई, सभी कारीगरों को रोजगार प्रदान करता रहा हूं, मेरे ही अन्दर लोक पारम्परिक काम-धन्धों की कलात्मकता समाहित है, मैं ही पारम्परिकता का संरक्षक हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मेरे अनेक नमूने, स्वरूप, डिज़ाईन ऐतिहासिक परम्पराओं एवं लोक कलाओं का हिस्सा रहे हैं।
घर के मुख्य द्वार पर सुसज्जित होकर मैं अपने आपको गौरवान्वित महसूस करता हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…मैं बुजुर्गों की जीवन के उतार-चढ़ावों का सहभागी हूं। मैं उनके समय व्यतीत करने का साक्षी भी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…? लोक साहित्य एवं संस्कृति में मेरे ऊपर… खोल्ले नहीं किवाड़ देखर्या बाट चौबारे आली… जैसे अनेकों गीत एवं रागनियां लिखी गई हैं, मैं साहित्य एवं संस्कृति की परम्पराओं को जीवित रखने का साक्षी हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
किवाड़ देणा, किवाड़ बंद करणा, आधा किवाड़ खोले रखणा, किवाड़ भिड़ाणा, किवाड़ खुले पड़े रहणा, किवाड़ पाच्छे को झांकणा, किवाड़ म्हैनें देखणा, किवाड़ के पल्ले की ओट लेणा न जाने कितने मुहावरों का जन्मदाता मैं ही तो हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… मेरे ही नाम पर दोखाना, तीनखाना, चारखाना, पंचमणि, शेखावटी, ज्योमैट्री, अंग्रेजी सभी दरवाजों की जोडिय़ों का प्रचलन लोकप्रिय हुआ है। यह सब मेरी ही तो देन हैं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…
मेरे ही नाम की जोडिय़ों पर लोगों ने लोककला को अपना धन्धा बना लिया है। मैं गरीब मजदूरों का आश्रय तथा करोड़ों का व्यापार करने वाले व्यापारियों का आधार हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं…मेरे ही नाम पर कला को बेचने वाले कितने ही बेदर्दी अमीर होने का झूठा घमंड करते हैं। आजकल मैं कला के नाम पर व्यापार का हिस्सा बन चुका हूं, मैं चौखट से उतरकर भी अपनी कला एवं संस्कृति का आधार हूं, क्योंकि मैं किवाड़ हूं… जैसा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के निदेशक युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डा.महा सिंह पूनिया ने लिखा।