न्यूज डेक्स संवाददाता
कुरुक्षेत्र। गोस्वामी तुलसीदास प्रकाण्ड विद्वान, उच्च कोटि के रचनाकार, परम भक्त, दर्शन और धर्म के सूक्ष्म व्याख्याता, सांस्कृतिक मूल्यों के प्रतिष्ठाता, बहुभाषाविद्, आदर्शवादी भविष्यदृष्ट्रा, विश्व-प्रेम के पोषक, भारतीयता के संरक्षक, लोकमंगल की भावना से परिपूर्ण तथा अद्भुत समन्वयकारी थे। यह विचार मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने गोस्वामी तुलसीदास की जयंती के उपलक्ष्य में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संस्कृत की समूची ज्ञान-परम्परा से सम्पूर्ण हिन्दी जगत को परिचित व निमज्जित कराने के कारण तुलसीदास न केवल तत्कालीन जनमानस में लोकप्रिय रहे बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ीयों के लिए भी प्रेरणा बन गये। रामचरितमानस में जीवन मूल्यों का क्षेत्र सीमित नहीं है, उनमें वैश्विक दृष्टि है और मानव मात्र के कल्याण की कामना है। संपूर्ण विश्व में महान् ग्रंथ रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास का जीवन लोक कल्याण को समर्पित था।
डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास केवल कवि ही नहीं बल्कि सामाजिक चेतना के अग्रदूत थे। अपनी कालजयी रचना श्री रामचरितमानस से उन्होंने समाज को जोड़ने का कार्य किया है। वर्तमान में भारत एक विखंडित समाज बन गया है। इसमें ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, शासक-शासित का भेद बढ़ता ही जा रहा है। आज के विषम परिवेश में तुलसी कृत रामचरितमानस के अनुशीलन से अनेकता में एकता के तत्वों को पहचाना जा सकता है और विखंडित समाज को अखंड भारत के आदर्श से जोड़ा जा सकता है।
समाज की वर्तमान स्थिति में राम की प्रासंगिकता पुनः दृष्टिगत हो रही है। रामचरितमानस के माध्यम से हमारे इस लोकप्रिय कवि का मूल उद्देश्य सामाजिक जीवन में उन मान्यताओं, मर्यादाओं एवं मूल्यों को स्थापित करना है, जिनसे समाज का मंगल हो तथा वह समृद्धशाली शक्तिशाली बने। रामचरितमानस में तुलसी ने रामराज्य की कल्पना की और राम के रूप में राजा का आदर्श सामने रखा। जिस राम के राज्य में लोग दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त होंगे, तभी वह रामराज्य कहलाएगा। तुलसीदास के रामराज्य की अवधारणा में समतामूलक समाज की परिकल्पना से परिपूर्ण है।
डॉ. मिश्र ने कहा कि रामचरितमानस में धार्मिक-दार्शनिक, सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन मूल्यों का निरूपण सुंदर ढंग से हुआ है। धर्म का उद्देश्य है मनुष्य को शुभत्व एवं शिवत्व की राह दिखा कर आत्मोन्नति की ओर अग्रसर कराना। इसके लिए तप और त्याग आवश्यक है। तुलसीदास भक्तिकाल के प्रतिष्ठित कवियों में से एक हैं। उनका काव्य और उनका दृष्टिकोण आज भी उतना ही लोकप्रिय व प्रासंगिक हैं जितना तत्कालीन समय में था। तुलसीदास की प्रासंगिकता का एक मुख्य कारण उन समस्याओं की निरंतरता है, जो तुलसी के तत्कालीन समय में विद्यमान थी और आज भी प्रासंगिक है।