न्यूज डेक्स संवाददाता
कुरुक्षेत्र।एक व्यक्ति के जीवन को आकार देने में उसके माता-पिता से अधिक एक अच्छे शिक्षक का योगदान होता है। हमारे देश की संस्कृति में शिक्षक को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। किसी एक व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने में एक अच्छे शिक्षक का मार्गदर्शन और सहयोग बहुत महत्व रखता है। यह विचार मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने विश्व शिक्षक दिवस के अवसर पर व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि विश्व शिक्षक दिवस शिक्षकों के महत्व और उनके योगदान को सम्मान दिलाता है। यह दिन पूरी तरह दुनिया भर के सभी शिक्षकों को समर्पित होता है। किसी राष्ट्र के लिए शिक्षक समाज में बढ़ते संकट के निमित्त भविष्य के लिए नया समाधान खोजता है। 1966 में यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की एक बैठक हुई जिसमें शिक्षकों के अधिकारों, जिम्मेदारियों, रोजगार और आगे की शिक्षा के साथ संरचना बनाने की बात कही गई थी। शिक्षक केवल एक राष्ट्र विशेष नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए महत्वपूर्ण होता है।
डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि शिक्षक है तो कल है, कल है तो राष्ट्र है, राष्ट्र है तो दुनिया है। विश्व शिक्षक दिवस का उद्देश्य दुनिया भर के शिक्षकों की सराहना करना, मूल्यांकन और सुधार पर लोगों का ध्यान केंद्रित करना है। विश्व में शिक्षकों की जिम्मेदारी, उनके अधिकार और आगे की पढ़ाई के लिए उनकी तैयारी को महत्व दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र में विश्व शिक्षक दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाने के लिए साल 1994 में लगभग 100 देशों के समर्थन से यूनेस्को की योजना को पारित कर दिया गया। इसके बाद 5 अक्टूबर 1994 से अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाया जाने लगा। 5 अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस घोषित करके वे विश्वभर के तमाम शिक्षकों को उनके द्वारा शिक्षा और विकास के क्षेत्र में दिए जा रहे अहम योगदान को लोगों को याद दिलाना है।
डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि आज भौतिक विकास एवं सूचना क्रांति के युग में मानवीय जीवन मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है। युवा पीढ़ी कहीं न कहीं अपने कर्तव्यों एवं दायित्व बोध से भटक रही है। युवाओं में नशा, हिंसा, प्रकृति एवं पर्यावरण के संरक्षण के प्रति रूचि का आभाव एवं अमानवीय कार्यों के प्रति रूझान बढ़ रहा है, तो आज ऐसे में संपूर्ण संसार में शिक्षकों का दायित्व अत्यधिक बढ़ जाता है। आज आवश्यकता है कि एक आदर्श विश्व का निर्माण हो। यह बिना शिक्षक समाज के योगदान के बिना संभव नहीं है।