Home haryana परम प्रतापी योद्धा वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप शौर्य, त्याग, पराक्रम, अदम्य साहस और वीरता की प्रतिमूर्ति थे-डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

परम प्रतापी योद्धा वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप शौर्य, त्याग, पराक्रम, अदम्य साहस और वीरता की प्रतिमूर्ति थे-डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

by ND HINDUSTAN
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मातृभूमि सेवा मिशन आश्रम परिसर में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में कार्यक्रम संपन्न

न्यूज़ डेक्स संवाददाता

कुरुक्षेत्र । राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले, अद्भुत शौर्य एवं अदम्य साहस के प्रतीक महाराणा प्रताप ने मातृभूमि के लिए त्याग और समर्पण आज भी प्रेणादायक एवं प्रासंगिक है। परम प्रतापी योद्धा वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप शौर्य, त्याग, पराक्रम और वीरता की प्रतिमूर्ति थे। यह विचार मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि के अवसर पर व्यक्त किए।

       डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि एक बार महाराणा प्रताप अपने परिवार के साथ जंगली अनाज और पत्तियों की रोटी खा रहे थे। जैसे ही महाराणा ने रोटी खानी शुरू की, उन्हें उनकी बेटी की चीख सुनाई पड़ी। उन्होंने देखा कि एक जंगली जानवर उनकी बेटी के हाथ से रोटी छीनकर भाग गया। इस घटना से महाराणा बहुत मर्माहत हुए और उन्होंने अकबर के सामने संधि प्रस्ताव भेजने का निर्णय कर लिया। जब इसकी सूचना अकबर को मिली, तो उसने बीकानेर के महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ को इसकी सच्चाई का पता लगाने के लिए कहा। इसके बाद, पृथ्वीराज ने एक कविता संदेश महाराणा के पास भिजवाया, जिसका सार था, अगर महाराणा प्रताप अकबर को बादशाह मानेंगे, तो उस दिन सूरज पश्चिम से निकलेगा। अगर महाराणा भी राजपूतों की शान नहीं रख पाए, तो हम सभी को अपना सिर शर्म से झुका लेना होगा। जब महाराणा ने यह कविता सुनी, तो उन्होंने पृथ्वीराज को जवाब देते हुए लिखा, जब तक सांस चलेगी, तब तक प्रताप अकबर को सिर्फ तुर्क कहकर ही बुलाएगा और सूरज वहीं से निकलेगा, जहां से प्रतिदिन निकलता है।

  डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा ने अपनी रणनीति बदल दी और वे जंगलों में चले गए। वे वहां परिवार सहित रहने लगे। महाराणा की चिंता फिर से सेना जुटाने की थी और इसके लिए उन्हें धन की आवश्यकता थी। महाराणा प्रताप की परेशानियों के बारे में जब स्थानीय व्यापारी भामाशाह को पता लगा, तो उन्होंने उनकी मदद करने की ठानी। कहा जाता है कि भामाशाह ने 25 लाख रुपये की नकदी और 20 हजार अशर्फी महाराणा प्रताप को सौंप दी। तत्पश्चात, महाराणा प्रताप ने भीलों की मदद से सेना तैयार की। चेतक महाराणा का सबसे प्रिय घोड़ा था। हल्दीघाटी में महाराणा बहुत घायल हो गये थे, उनके पास कोई सहायक नहीं था। ऐसे में महाराणा ने चेतक की लगाम थामी और निकल लिए। उनके पीछे दो मुगल सैनिक लगे हुए थे, पर चेतक की रफ्तार के सामने दोनों ढीले पड़ गए। रास्ते में एक पहाड़ी नाला बहता था। चेतक भी घायल था पर छलांग मार नाला फांद गया और मुगल सैनिक मुंह ताकते रह गए। ऐसे में महाराणा की जान तो बचा दी पर खुद शहीद हो गया।

       रोटरी क्लब कुरुक्षेत्र के पूर्व प्रधान समाज सेवी आशीष सभरवाल अति विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहकर बच्चों को महाराणा प्रताप के जीवन एवं कार्य के बारे मे बताया। अमेरिका से आए अभियुत त्यागी ने मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों के साथ महाराणा प्रताप के जीवन संबंधी जानकारियां सांझा की।

       कार्यक्रम में कपिल मदान सहित मिशन के सदस्य एवं अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे। मातृभूमि सेवा मिशन परिवार की ओर से कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि अशीष सभ्रवाल को मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने अंगवस्त्र एवं प्रतिक चिन्ह देकर सम्मानित किया।

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