

न्यूज डेक्स संवाददाता
करनाल। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से रामलीला ग्राउंड, कुंजपुरा में पांच दिवसीय श्रीराम कथामृत के कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया है। जिसके चतुर्थ दिवस के अंतर्गत श्रीगुरु आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी प्रवीणा भारती ने प्रभु की कथा का रसपान करवाते हुए राम चरित मानस में से शबरी प्रसंग के अंर्तगत भगती माता शबरी की गाथा को बाचते हुए कहा शबरी एक साधारण स्त्री नही थी। वह तो भक्ति की वह मनी थी। जिसने गरीबी के रहते हुए भी प्रभु के प्यार को प्राप्त किया।
कहते है कि जब शबरी घर से भाग कर जंगल में जाकर संतो की सेवा करती है तो उसके मन में वैराग्य पैदा होता है और वह चोरी-चोरी उनकी सेवा करती है। जब संत उसे नीच कहते है तो उसके मन में उनके प्रति ईष्या भाव पैदा नही होता। आगे चलकर उनके जीवन मातंग मुनी जी आगमन होता है। और मातंग मुनी जी के कहने पर शबरी उनके आश्रम में जाकर सेवा करती है और एक दिन मातंग मुनी अपने शरीर के त्याग के समय यह कहते है कि एक तेरी कुटिया में जग के पालक श्री राम जी के रूप में आएगें। और उसके बाद शबरी उनकी प्रतीक्षा करती है दिन, मास, सालों के इंतजार के बाद प्रभु श्री राम उनकी कुटीयां में आते है तो शबरी अपने अंतः कर्ण में खुशी की चर्म सीमा को प्राप्त करती है।
प्रभु श्री राम जी प्रेम बस होकर शबरी के झुठे बेर खाते है और उसके उपरांत शबरी सदा के लिए प्रभु के चरणों में लीन हो जाती है। यहां पर शबरी के प्रेम के कारण उसके झुठे बेर खाकर प्रभु सारी ही मानवता को यह संदेश देते है कि कोई भी मानव चाहे किसी भी कुल में, गरीब हो या अमीर, किसी भी रूप रंग का हो मै तो उसके प्रेम के अधीन होकर बिक जात हुँ। क्याेंकि कोई भी मानव अपनी कुल, जाति, रंग रूप से महान नही होता अपितु वह अपने कर्म से महान होता है।
कथा को आगे वाचते हुए साध्वी ने कहा कि माता शबरी के मानिद आज हर मानव प्रभु की प्रयास करता है। लेक्नि सही मार्ग न मिलने के कारण उसकी दिशाहीन है। वह भटक जाता है। इंसान के मन में प्रेम तो है लेक्नि भगवान के लिए नही इस नश्वर संसार के लिए है और मानव मोह के आधीन होकर इसे प्रेम का नाम देता है। जब कि हमारे संत कहते है कि जिस संसार को तुम अपना समझता है यह तेरा अपना नही है। अपने मन को अगर तुम कही पर लगाना चाहते हो तो भगवान की भक्ति में लगाओ, संसार में मन को लगाकर तो धोखा ही मिलता है।
आगे साध्वी ने कहा कि प्रभु श्री राम जी ने माता शबरी को नवधा भक्ति का वरदान देते हुए कहा कि ‘‘ प्रथम भक्ति संतन कर संगा’’ यदि प्रभु की प्राप्ती का प्रयास करना है तो प्रथम कार्य है संतो की शरण, जो हमें ईश्वर से मिलने का मार्ग प्रदान करते है। जैसे नदी के किनारे से दुसरे किनारे पर जाने के लिए हमें एक नौंका की अवश्यक्ता है। ठीक वैसे ही इस संसार रूपी नदी को पार कर प्रभु से मिलने का मार्ग है संत जन। उनकी ही शरण में जाकर हमें ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग पता चलता है। कथा का समापन प्रभु की पावन आरती से हुआ।