Home haryana नैतिक मूल्यों का विकास और बुजुर्गों का सम्मान गुरुकुल शिक्षा पद्धति का मुख्य उद्देश्य-आचार्य देवव्रत

नैतिक मूल्यों का विकास और बुजुर्गों का सम्मान गुरुकुल शिक्षा पद्धति का मुख्य उद्देश्य-आचार्य देवव्रत

by ND HINDUSTAN
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आचार्यश्री ने प्राकृतिक खेती से होगा पर्यावरण का संरक्षण, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा देश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिये जाने पर जताया आभार, बहनों को रक्षाबंधन पर्व की बधाई दी

एनडी हिंदुस्तान संवाददाता

कुरुक्षेत्र।मारे बच्चों में आपसी भाईचारा, राष्ट्र-प्रेम, दया, करूणा जैसे नैतिक मूल्यों के विकास के साथ-साथ वे बुजुर्गों का सम्मान करें, ऐसी शिक्षा हमारी प्राचीन गुरुकुलीय प्रणाली में शामिल रही है। बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनें और भारतीय सभ्यता से जुड़कर देश की उन्नति में सहायक हों, यही गुरुकुल शिक्षा का उद्देश्य हैं। गुरुकुलों में आचार्य बच्चों की सुरक्षा गर्भस्थ शिशु की भांति करता है और जो बच्चे आचार्य के मार्गदर्शन में कठोर परिश्रम के साथ विद्यार्जन करते है, वे एक दिन दुनिया में अलग पहचान बनाते हैं। उक्त शब्द आज गुरुकुल कुरुक्षेत्र में आयोजित उपनयन संस्कार एवं वृक्षारोपण समारोह को सम्बोधित करते हुए गुजरात के राज्यपाल एव गुरुकुल के संरक्षक आचार्य देवव्रत ने कहे। उन्होंने कहा कि वर्तमान में प्रकृति और पर्यावरण को बचाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है जिसे केवल प्राकृतिक खेती के माध्यम से बचाया जा सकता है।

स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इस विषय को लेकर काफी गंभीर है, उनके दिशा-निर्देशन में प्राकृतिक खेती के प्रचार-प्रसार हेतु अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे है ताकि देश का किसान जहरीली रासायनिक खेती को छोड़कर प्राकृतिक खेती को अपनाएं। आचार्यश्री के साथ गुरुकुल के सभी अधिकारियों ने यज्ञवेदी पर बैठे सभी ब्रह्मचारियों पर पुष्प-वर्षा कर उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद प्रदान किया। इससे पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष आचार्य दयाशंकर शास्त्री के ब्रह्मत्व में 21 कुण्डीय यज्ञ का आयोजन किया गया जिसमें सभी नवप्रविष्ट ब्रह्मचारियों को यज्ञोपवीत धारण कराये गये। 

‘उपनयन’ का अर्थ बताते हुए आचार्य ने कहा कि गुरु के समीप रहकर जीवन निर्माण करना ‘उपनयन’ कहलाता है। प्राचीनकाल में गुरुकुलों में राजा और रंक सभी के बच्चे एक ही वातावरण में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे, उनमें कोई भेदभाव नहीं होता था और गुरुकुल में रहकर वे अक्षरज्ञान के साथ-साथ नैतिक जीवन मूल्यों का पाठ सीखते थे। आजकल जो वृद्धाश्रम का कल्चर समाज में चल रहा है, यह हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। हमारे यहां तो आचार्य देवो भवः, पितृ देवो भवः, मातृ देवो भवः की परम्परा रही है। हमारे बच्चे अपने गुरुओं, बड़े-बुजुर्गों एवं माता-पिता का पूरा सम्मान करें, यह सबसे जरूरी है। आचार्य ने कहा कि उपनयन संस्कार में ब्रह्मचारियों को जनेऊ धारण कराया जाता है जिसके तीन धागें हमें तीन ऋणों का स्मरण कराते हैं, पहला है पितृ ऋण, दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा है देव ऋण। उन्होंने कहा कि यज्ञोपवीत अथवा जनेऊ के ये धागे हमें अपने माता-पिता, गुरु तथा समाज के प्रति कर्त्तव्यों की याद दिलाते हैं। अंत में उन्होंने सभी बहनों को रक्षाबंधन पर्व की बधाई दी। इस अवसर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम में आचार्य ने कपूर का पौधा लगाया। वहीं ओएसडी टू गर्वनर राजेन्द्र विद्यालंकार, प्रधान राजकुमार गर्ग, निदेशक बिग्रेडियर डॉ. प्रवीण कुमार, प्राचार्य सूबे प्रताप तथा व्यवस्थापक रामनिवास आर्य ने भी अलग-अलग किस्म के पौधे गुरुकुल परिसर में रोपित किये।

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