महाराणा प्रताप की जयंती के उपलक्ष्य में मातृभूमि सेवा मिशन धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के तत्वावधान में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा शौर्य संवाद कार्यक्रम आयोजित
एनडी हिन्दुस्तान
कुरुक्षेत्र । अदम्य साहस, समर्पण, बलिदान, स्वाभिमान, देशभक्ति के प्रतीक वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का संपूर्ण जीवन मातृभूमि भारत की एकता एवं अखंडता के लिए समर्पित था।महाराणा प्रताप एक व्यक्ति नहीं, एक विचारधारा है। महाराणा प्रताप व्यक्तित्व ऐसा है कि उन्होंने मृत्यु की नाद पर जीवन को थिरकना सिखाया और उन्होंने वीरता के प्रतिमानों को कई नए आयाम दिए। महाराणा प्रताप का संघर्ष सदैव प्रेरणाप्रद रहेगा। महाराणा प्रताप के समक्ष दो रास्ते थे, एक अन्य शासकों की भाँति स्वाभिमान का समर्पण कर शाही जिंदगी जीना और दूसरा संघर्ष पूर्वक जीवन,जो उन्होंने जीया। उनका जीवन आज प्रत्येक देशवासी के लिए प्रेरणा का पुंज है।
यह विचार महाराणा प्रताप की जयंती के उपलक्ष्य में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा आयोजित शौर्य संवाद कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने व्यक्त किये। कार्यक्रम का शुभारम्भ भारतमाता एवं महाराणा प्रताप के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन, माल्यार्पण एवं पुष्पार्चन कर हुआ। मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने महाराणा प्रताप के जीवन से सम्बन्धित अनेक प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत किये।
महाराणा प्रताप के संघर्षशील जीवन पर प्रकाश डालते हुए डा. मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा
महाराणा प्रताप का हल्दीघाटी के युद्ध के बाद का समय पहाड़ों और जंगलों में व्यतीत हुआ। अपनी पर्वतीय युद्ध नीति के द्वारा उन्होंने अकबर को कई बार मात दी। यद्यपि जंगलों और पहाड़ों में रहते हुए महाराणा प्रताप को अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ा, किंतु उन्होंने अपने आदर्शों को नही छोङा। महाराणा प्रताप के मजबूत इरादो ने अकबर के सेनानायकों के सभी प्रयासों को नाकाम बना दिया। उनके धैर्य और साहस का ही असर था कि तीस वर्ष के लगातार प्रयास के बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को बंदी न बना सका। महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा ‘चेतक‘ था जिसने अंतिम सांस तक अपने स्वामी का साथ दिया था। महाराणा प्रताप मातृभूमि भारत के महान उपासक एवं भारत एवं भारतीयों के सम्पोषक थे।
डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा विश्व के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा शासक रहा हो जिसकी जनता इतनी विकट परिस्थितियों के में भी अत्यंत प्रतिबद्धता से शासक के साथ खङी रही। तीस से अधिक वर्षों तक युद्धों के कारण मेवाड़ उजड़ा हुआ था, जनता को भी अपने घरों को छोड़कर पहाड़ों में जीवन व्यतीत कर रही थी। जिस जनता ने तीस हजार से अधिक लोगों का नरसंहार देखा हो और फिर भी वे राणा प्रताप के स्वाभिमान एवं स्वाधीनता की चाह के प्रति उनके साथ हों तब यह कहना उचित होगा कि राणा प्रताप जनप्रिय एवं महान थे। महाराणा प्रताप का सामाजिक जीवन उनके शासनकाल और मेवाड़ के इतिहास से गहराई से जुड़ा था। वे एक प्रगतिशील शासक थे जिन्होंने समाज के दलित और पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ा और उन्हें सामाजिक पहचान दिलाई, साथ ही संकीर्णता से ऊपर उठकर सर्वधर्म समभाव को अपनाया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम से हुआ। कार्यक्रम में आश्रम के विद्यार्थी,सदस्य आदि उपस्थित रहे।