सुविख्यात पुरातत्वविद् राजेंद्र सिंह राणा को श्रद्धांजली
राजेश पुरोहित जी उड़ीसा से तो राजेंद्र राणा जी उत्तर प्रदेश यानी वर्तमान उत्तराखंड से
दोनों एक साथ 1987 में पहली बार कुरुक्षेत्र आए
दोनों पहली बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रोजेक्ट से जुड़े
1991 से दोनों श्रीकृष्ण संग्रहालय कुरुक्षेत्र की वजह से एक साथ रहे
दोनों 2025 में एक साथ 63-63 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह गये
राजेश शांडिल्य
एनडी हिन्दुस्तान
पंचकूला।राणा जी,शायद यहां के लोग आपको भूल जाए, मगर जो काम आपने धर्मक्षेत्र के 48 कोस के लिए किया,उसे कुरुक्षेत्र की पावन भूमि कभी भुला नहीं सकेगी। दोनों का जीवन एक दूसरे के इर्दगिर्द रहा। दोनों तुला राशि और दोनों के नाम र की तरह प्रांत के नाम पहला अक्षर भी उ से ही शुरु होता था। राजेश पुरोहित जी उड़ीसा से कुरुक्षेत्र आए,जबकि राजेंद्र सिंह राणा जी वर्तमान के उत्तराखंड जो उस समय संयुक्त उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, के कालीमठ से कुरुक्षेत्र आए थे। दोनों का कुरुक्षेत्र में आगमन 1987 में हुआ था। यह दोनों उस दौर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक प्रोजेक्ट से एक साथ जुड़े थे। बाद में 1991 में जब श्रीकृष्ण संग्रहालय का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकट रमन जी ने किया तो पुरोहित जी और राणाजी श्रीकृष्ण संग्रहालय में इसकी अहम जिम्मेदारी से जुड़े। यह जोड़ी संग्रहालय में 2011 तक साथ काम करती रही,मगर 2 मार्च 2025 को 63 वर्ष की आयु में जब अकस्मात पुरोहित जी परलोक सिधारे तो किसी ने सोचा नहीं होगा कि एकदम स्वस्थ दिखने वाले राजेंद्र राणा जी भी 2025 में सिर्फ पांच माह बाद ही 63 वर्ष की आयु में …।
संयोग देखिये, श्रीकृष्ण संग्रहालय के स्थापना दिवस के दिन ही राणा जी पंच तत्व में विलीन हुए। मैं आज गुरुग्राम से अभी पंचकूला पहुंचा था कि एक संदेश देखा,झटका लगा। दुनिया से सभी को जाना है,लेकिन पुरोहित जी के बाद राणा जी का अकस्मात…। निश्चित रुप से यह कुरुक्षेत्र के लिए बड़ा झटका है,जो इनके योगदान को जानते है। बहरहाल इनका जाना बड़ी क्षति से कम नहीं,विशेषकर कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के लिए।मैं कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के बारे में ज्यादा नहीं लिखना चाहता,क्योंकि मुझे भी रोग है कि जब लिखता हूं तो फिर 32 पुतलियों वाले सिंहासन की तरह कई किस्से कहानियां….। सच्चाई तो यह है कि यहां सीढ़ियां भर चढ़ने से कई तर गये,मगर जिन्होंने मेहनत से पूरा दरिया पार किया,उनका हाल ए बयां राणा जी जैसे कर्मयोगी के अंत में देख लें।परमपिता परमेश्वर राणा जी के परिवार को शक्ति दे।
पता चला है कि राणा जी, जिनकी योग्यता का लाभ कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड करीब 35 साल से उठा रहा था,उनकी पेंशन तक नहीं है,एक बेटी की शादी हो चुकी है,जबकि दूसरी अविवाहित है और पीएचडी कर रहीं हैं,सबसे छोटा बेटा है,वह एनसीआर के किसी बड़े संस्थान से शिक्षा ग्रहण कर रहा है। काश पेंशन होती तो…। पुरोहित जी अपने और परिवार के भविष्य की वजह से ना चाहते हुए ही कुरुक्षेत्र छोड़ कर भारत सरकार की सेवाओं में गरिमापूर्ण पद पर गये थे। राणा जी के जीवनकाल में उनके पास भी कई अवसर आये थे,लेकिन उन्होंने कुरुक्षेत्र को ही ताउम्र अपनी कर्मस्थली के रुप में बनाये रखा।
बेहद सरल और सादगी पसंद राणा जी से जब भी मिलना होता तो काफी आत्मीयता से मिलते। और स्नेहपूर्वक रोक कर मेरी पसंद की वो गुड़हल की चाय पिलाना नहीं भूलते। दैनिक भास्कर,दैनिक जागरण और अमर उजाला में अपने कार्यकाल के दौरान अनेक अवसर रहे जब पुरोहित जी और राणा जी से तथ्यों की सटीक जानकारी लेकर स्टोरी प्रकाशित की। राणा जी अक्सर कह देते थे शांडिल्य जी कृपा कर मेरा नाम प्रकाशित नहीं करना उच्चाधिकारियों को कई बार दिक्कत होती है। मेरे साथ कई बार वे प्राचीन स्थलों पर भी गए और कई बार एक साथ मंच पर भी रहे ।
अनगिनत यादें हैं,उनसे जुड़ी। एक बार मेरी टीम के एक संवाददाता ने उनके केंद्र के बारे में कोई खबर लिखी,जो उनके खिलाफ जाती थी। मैं उस रोज करनाल संपादकीय टीम की बैठक में था। उनका फोन आया। शायद पहली और आखिरी बार राणा जी के बात करने का तरीका उनकी शैली से अलग लगा। बाद में पता चला किसी पत्रकार साथी ने उन्हें उकसाया है। मैंने कुरुक्षेत्र पहुंच कर बात करने को कहा। जब मिला तो उन्होंने पूरा घटनाक्रम बताया। उनकी बात ठीक थी और मेरा साथी 100 प्रतिशत गलत। उसके बाद उनकी खबर मेरे यहां कभी प्रकाशित नहीं हुई।
पुरोहित जी और राणा जी को कुरुक्षेत्र कभी भूलने नहीं देगा। तीन से ज्यादा दशकों तक यहां रहते हुए धर्म संस्कृति के लिए जो कार्य किये वह सराहनीय है । कुरुक्षेत्र के महत्व की दृष्टिगत इनके द्वारा तैयार किया गया डॉक्यूमेंट इतना महत्वपूर्ण है कि उसे जमाना याद रखेगा। खास कर कुरुक्षेत्र।जी हां मेरा कुरुक्षेत्र। इस कुरुक्षेत्र में कईं आए और चले गए। इनमें कई नाम विशेष है,जिन्होंने कुरुक्षेत्र की सेवा दिल से की।
इनके द्वारा किए गए अप्रतिम कार्य कुरुक्षेत्र की नस नस में रहेंगे,क्योंकि एक कालखंड ऐसा भी था जब कुरुक्षेत्र के अनगिनत तीर्थ लुप्त प्रायः थे,लेकिन इनके अस्तित्व को बचाने के लिए जो भगीरथ प्रयास नब्बे के दशक के अंत में पुरोहित जी और राणा जी ने किये,उसकी बदौलत यहां की पुरातन तीर्थ परंपरा ना केवल सहेजी जा रही है,बल्कि अब अधिकांश गुलजार है। गुलजार से याद आया इनमें एक बड़ा नाम है हमारे भारत रत्न गुलजारी लाल नंदा जी का। उनके प्रयासों से यहां 1968 में कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड की स्थापना हुई थी। इसी कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के प्रयासों से 28 जुलाई यानी आज ही के दिन 1991 में श्रीकृष्ण संग्रहालय अस्तित्व में आया,जिसे अब तक देश दुनिया के करोड़ों लोग टिकट लेकर देख चुके हैं।
इस संग्रहालय में आज अमूल्य प्राचीन धरोहरों का खजाना है।इसके अस्तित्व में आने के साथ दो ऐसे चेहरे कुरुक्षेत्र को मिले थे,जिन्होंने कुरुक्षेत्र के इस संग्रहालय के साथ साथ अपनी योग्यता और क्षमताओं का भरपूर इस्तेमाल कुरु भूमि के 48 कोस (वर्तमान में हरियाणा के 5 जिलों) में धर्म संस्कृति के लुप्त हो रहे चिह्नों को संरक्षित कराने में और इनका रिकॉर्ड तैयार कराने में अपना योगदान दिया। इनमें पहला बड़ा नाम रहा राजेश पुरोहित जी का और दूसरा उनके अभिन्न मित्र पुरातत्वविद राजेंद्र राणा जी का।
देश-दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर कुरुक्षेत्र के पौराणिक स्थलों और इसके महत्व की जानकारी जब हासिल की जाती है, उसमें बड़ा हिस्सा पुरोहित जी और राणा जी के योगदान से उपलब्ध होता है।सोचा नहीं था कि साल 2025 इतना निर्दयी होगा पहले 2 मार्च को राजेश पुरोहित जी को छीना और आज 28 जुलाई जब कुरुक्षेत्र संग्रहालय को अपनी वर्षगांठ मनानी थी,उसी दिन राजेंद्र राणा जी कुरुक्षेत्र में ही पंचतत्व में विलीन हुए। हालांकि देहरादून में एक सुंदर आशियाना बनाने के बावजूद राणा जी कुरुक्षेत्र में ही रहकर केडीबी के लिए सेवाओं को जारी रखे हुए थे।पता चला है कि देहावसान से दो दिन पहले जब वह करनाल अस्पताल में दाखिल थे,तब भी कुरुक्षेत्र के लिए चल रही एक तैयारी को लेकर फाइल पर काम अस्पताल के बिस्तर पर ही किया था। यह शायद उन्होंने और उनके साथियों ने सोचा नहीं होगा कि राणा जी इस फाइल पर आखिरी बार काम कर रहे हैं।
पुरोहित जी और राणा जी भारत के तीसरे सबसे बड़े राष्ट्रीय पुरस्कार पद्म भूषण से सम्मानित स्वर्गीय दर्शन लाल जैन जी के सरस्वती शोध संस्थान में लंबे समय तक जुड़े रहे।इन्होंने साथ मिलकर सरस्वती नदी के लिए काफी काम किया। भारत की अलग परंपराओं में कुरुक्षेत्र के तीर्थों की संख्या का उल्लेख मिलता है। इनमें कुछ परंपराओं में मान्यता है कि इस पावन भूमि पर 767 तीर्थ हैं, तो कुछ मान्यता है कि 367 तीर्थ हैं। इनमें से 134 तीर्थों को सूचीबद्ध करने का जो उल्लेखनीय है कार्य इस बेमिसाल जोड़ी ने सिर्फ एक साल में किया था,वह अपने आप में एक रिकॉर्ड है,क्योंकि 1998 से 1999 के बीच महाभारतकालीन कुरुक्षेत्र यानी वर्तमान में हरियाणा के 5 जिलों में कुरुक्षेत्र,कैथल,करनाल,जींद और पानीपत की भूमि से लगभग लुप्त प्राय 134 लुप्त तीर्थों की ना केवल खोज की गई थी,बल्कि इसका डॉक्यूमेंट तैयार करके सरकार को भेजा गया था। अब तक 184 तीर्थों का रिकार्ड हिंदी और अंग्रेजी भाषा में तैयार हो चुका है। इसलिए कह रहा हूं कुरुक्षेत्र पुरोहित जी और राणा जी को कभी भूलेगा।