
क्या सब नियमों की पालना हो रही है जो तीर्थ पुरोहितों उठाने पर तुली है केडीबी
चंदन की छाल नहीं,जीवों की असली खाल से बनी सामग्री बिक सकती है तीर्थ पर तो तीर्थ पुरोहित से क्यों परहेज
इस तीर्थ का गौरवशाली इतिहास धंधा,दुकान,डेकोरेशन और टेंडर से नहीं,तीर्थ पुरोहितों और धर्मार्थ सेवा से है
यहां शासक प्रशासक आते हैं और जले जाते हैं,मगर तीर्थ परंपरा युगों युगों से चली आ रही है
एनडी हिंदुस्तान संवाददाता
कुरुक्षेत्र।तर्कसंगत कोई बात अनेक बार बताने पर समझ ना आए तो यह मान लें सामने वाला व्यक्ति विषय का को समझ चुका है,लेकिन इत्तेफाक नहीं रखता।लिहाजा तर्क कुछ भी दो,वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने को आतुर है। यह स्थिति पिछले दो रोज से अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव-2025 में बनी हुई है। कुरुक्षेत्र के तीर्थ पुरोहित और गीता महोत्सव आयोजन से जुड़े एक अधिकारी आमने सामने है। दोनों पक्षों को समझाया जा रहा है,लेकिन स्थिति जस की तस है।
विषय यह है कि 21 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का शुभारंभ 15 नवंबर 2025 को हरियाणा के राज्यपाल द्वारा किया जा चुका है। कुरुक्षेत्र में स्थित विश्वविख्यात ब्रह्मसरोवर के परिक्रमा पथ और सदरियों में सरस मेला और शिल्पकारों के अलावा फूड स्टाल और अन्य प्राईवेट स्टाल लग चुके हैं,जोकि 5 दिसंबर 2025 तक मेला क्षेत्र की शोभा बढ़ाएंगे।
अभी तक इनमें से किसी तरह की दुकान को लेकर किसी ने आपत्ति नहीं जताई,क्योंकि मेला आयोजकों द्वारा आन लाइन आवेदन लेकर जारी किए गए इन स्टालों को नियमानुसार मेलावधि के लिये तयशुदा शुल्क पर अलाट किया है। यह मेला व्यवस्थित ढंग से हो,इसके लिये कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड,जिला पुलिस प्रशासन के साथ साथ केंद्र एवं हरियाणा सरकार की अलग अलग एजेंसियां जुटी है।मेले में पहले ही दिन से अच्छी खासी भीड़ उमड़ना शुरु हो चुकी है।
हरिद्वार और भारत के अन्य प्रमुख तीर्थों पर जाने वाले श्रद्धालु भली प्रकार से जानते हैं कि इन जगहों पर तीर्थ पुरोहितों के बैठने के लिए स्थान उपलब्ध हैं।यही पुरोहित तीर्थ परंपरा को पूरा कराने में अपनी भूमिका निभाते हैं। भारत के इन प्रमुख तीर्थों की तरह ब्रह्मसरोवर के केवल एक घाट पर श्रीब्राह्मण एवं तीर्थोद्धार सभा द्वारा पंडों के बैठने के लिए तख्त रखवाए गए हैं।हालांकि अच्छा होता घाट की शोभा बढ़ाने के लिए रजिस्टर्ड तीर्थ पुरोहितों को तख्त की बजाय आकर्षक स्थान कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड उपलब्ध कराता।
खैर वह तो संभव नहीं हुआ,लेकिन जो व्यवस्था उपलब्ध थी,उन्हें वहां से भी अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव की व्यवस्था के नाम पर उठाने के लिए जोर आजमाइश हो रही हैं।सनातन परंपराओं को बढ़ावा देने वाली सरकार में अगर इस तरह की हिमाकत करने आतुर है तो शायद यह सरकार को भी यह नागवार होगा। अब उम्मीद यही की जा रही है कि समय रहते इस समस्या का हल हो। ताकि इस तरह के अधिकारी भी तीर्थ की मर्यादा को समझें,क्योंकि तीर्थ का महत्व वहां बिकने वाली सामग्री से नहीं,बल्कि तीर्थ परंपराओं को 365 दिन चलाने वाले यजमान और पुरोहित की आस्था से है।
पुरोहित इस कारगुजारी से गुस्से में हैं,इनका कहना है कि अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो उन्हें धरने पर बैठने को विवश होना होगा। इन्होंने कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के उन दो सदस्यों को भी खरी खोटी सुनाई जो तीर्थ पुरोहित समाज से हैं। इन्होंने कहा कि नियमानुसार जिस ब्रह्मसरोवर की परिक्रमा में वाहनों का आवागमन नहीं हो सकता,जूते पहन कर नहीं जा सकते और भी कई तरह के सख्त नियमों की पालना नहीं होती,लेकिन केडीबी अधिकारी व्यवस्था के नाम पर उन्हें उठवाने पर अड़े हैं।बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि मृत जीवों चमड़े से बनी बेल्ट,बैग और शूज इत्यादि तीर्थ पर बिक्री हो सकते हैं,तो तीर्थ पुरोहितों के घाट पर बैठने पर क्या आपत्ति,जबकि वे तो तीर्थ परंपरा का हिस्सा हैं।