Home Kurukshetra News कुवि के विधि विभाग में आयोजित प्लेनरी सेशन में गीता के वैश्विक प्रभाव पर अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने रखे विचार

कुवि के विधि विभाग में आयोजित प्लेनरी सेशन में गीता के वैश्विक प्रभाव पर अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने रखे विचार

by ND HINDUSTAN
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एनडी हिन्दुस्तान

कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में तथा विधि विभाग की अधिष्ठात्री एवं अध्यक्षा प्रो. प्रीति जैन के निर्देशन में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के विधि विभाग में 10वीं अंतरराष्ट्रीय गीता कॉन्फ्रेंस-2025 के अंतर्गत प्लेनरी सेशन “नेविगेटिंग द क्रॉस रोड्स ऑफ चॉइस, कॉन्फ्लिक्ट एंड कन्सीक्वेन्सेस” अत्यंत गरिमामय, विद्वतापूर्ण और बहु-आयामी विचार-विमर्श के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
यह सत्र इस दृष्टि से विशेष रहा कि इसमें भारत सहित पर्थ, नेपाल, बेलारूस और पोलैंड के प्रतिष्ठित विद्वानों ने गीता के शाश्वत सिद्धांतों को आधुनिक विश्व की चुनौतियों, नैतिक निर्णय-प्रक्रिया, संघर्ष-प्रबंधन, राजनीतिक-सामाजिक दुविधाएँ, वैश्विक तनाव, नेतृत्व के आदर्शों तथा मानवीय मूल्यों से जोड़ते हुए प्रेरक व्याख्यान प्रस्तुत किए।
स्वागत भाषण में सत्र संयोजक प्रो. प्रीति जैन ने कहा कि गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक ‘डिसीजन-मेकिंग मॉडल’ है, जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए नैतिक दिशा निर्धारित करता है।
स्वामी अपरोक्षणंद (पर्थ) ने अनिश्चितता, विकल्पों और परिणामों पर दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए श्रेयस के चयन को मानवता के लिए सर्वाेत्तम बताया। उन्होंने कहा कि जैसे कृष्ण ने अर्जुन को आत्मचिंतन द्वारा सही मार्ग का बोध कराया, वैसे ही श्रेयस व्यक्ति को दीर्घकालिक कल्याण और नैतिक चेतना की ओर ले जाता है।
प्रो. (डॉ.) नारायण प्रसाद गौतम (नेपाल) ने गीता के दृष्टिकोण से मानसिक संतुलन, आध्यात्मिक स्पष्टता, न्याय-अन्याय, कर्मयोग एवं जनकल्याण जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की।
श्री इल्या तरकन (बेलारूस) ने हिंदू धर्म की विद्वानों द्वारा की गई विभिन्न व्याख्याओं, भगवद्गीता की अवधारणाओं और हिंदू आंदोलन पर अपने अनुसंधान को साझा किया।
प्रो. अन्ना रूचिंस्का (पोलैंड) ने भगवद गीता के वैश्विक प्रभाव, विशेषकर पोलैंड में उसकी स्वीकार्यता और गीता-पाठ के लाभों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि यूरोपीय दार्शनिक परंपराओं में भी गीता आत्म-नियंत्रण, मानव व्यवहार और नेतृत्व के मार्गदर्शन का प्रमुख स्रोत बनती जा रही है।
प्रो. कुलभूषण चंदेल (एच.पी. विश्वविद्यालय, शिमला) ने जीवन की जटिल चुनौतियों को गीता के सिद्धांतों-निष्काम कर्म, धर्म, आत्मचिंतन और कर्म की जवाबदेही से जोड़कर समझाया और कहा कि कुरुक्षेत्र की यह भूमि स्वयं में भाग्यशाली एवं प्रेरणादायी है।
प्रो. विभा अग्रवाल (संस्कृत विभाग) ने मूल श्लोकों के माध्यम से निष्काम कर्म, मनोवैज्ञानिक संतुलन और श्रेयस-प्रेयस के मार्ग को उपनिषद के नचिकेता प्रसंग से जोड़कर अत्यंत प्रभावशाली प्रस्तुति दी।
सत्र का समापन आयोजन सचिव डॉ. प्रियंका चौधरी द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ। कार्यक्रम की सफलता में प्रोफेसर अमित लुदरी, प्रोफेसर सुशीला देवी चौहान, प्रोफेसर महावीर, डॉ. दीप्ति चौधरी, डॉ. प्रमिला, डॉ. अंजु बाला, डॉ. सुधीर कुमार, डॉ. पूजा, डॉ. प्रीति भारद्वाज, डॉ. उर्मिला, डॉ. बबीता पब्बी, डॉ. रंजिता राणा और डॉ. सुनील भारती सहित सभी प्राध्यापकगणों ने सक्रिय भूमिका निभाई।
विधि संस्थान से डॉ. आर. के. सिरोही, डॉ. नीरज बातिश, डॉ. सुमित और डॉ. सुरेन्द्र भी उपस्थित रहे। शोधार्थियों एवं छात्र-छात्राओं की उत्साही एवं सृजनात्मक भागीदारी ने सत्र में बौद्धिक ऊर्जा और जीवंत संवाद जोड़ा।

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