Home Kurukshetra News प्रकृति के असीमित दोहन को रोकने हेतु सबको साथ आना होगा : प्रो. सतहंस

प्रकृति के असीमित दोहन को रोकने हेतु सबको साथ आना होगा : प्रो. सतहंस

by ND HINDUSTAN
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‘‘भारतीय सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में अक्षय ऊर्जा एवं प्रकृति के साथ समन्वय तथा भविष्य की संभावनाएं’’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन 

न्यूज डेक्स संवाददाता

कुरुक्षेत्र, 6 फरवरी। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान द्वारा ‘‘भारतीय सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में अक्षय ऊर्जा एवं प्रकृति के साथ समन्वय तथा भविष्य की संभावनाएं’’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान से प्रोफेसर सतहंस मुख्य वक्ता रहे। संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह ने मुख्य वक्ता का परिचय कराते हुए बताया कि प्रो. सतहंस 25 वर्षों के समग्र शिक्षण, अनुसंधान और प्रशासनिक अनुभव के साथ इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर हैं। उनके अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 75 से अधिक शोध लेख प्रकाशित हुए हैं।

उन्होंने नई दिल्ली के अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में तीन वर्षों तक राष्ट्रीय स्तर पर सेवा की है। देश भर के एनआईटीज़ में संकाय चयन के लिए राष्ट्रपति द्वारा नामित प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य किया। डॉ. रामेन्द्र सिंह ने प्रकृति संरक्षण पर कहा कि सरस्वती नदी ऋग्वैदिक काल में प्रवाहमान और वेगवती नदी मानी जाती थी, आज वह विलुप्त हो गई है। इस प्रकार की देशभर में अनेकों नदियां हैं, वह अन्तःसलिला न हों, इसलिए आवश्यक है कि हम सब नदियों का एवं संस्कृति का संरक्षण करें।

मुख्य वक्ता प्रो. सतहंस ने कहा कि वर्तमान साइंस एवं टेक्नोलॉजी के युग में प्रकृति का असीमित दोहन हो रहा है, जिसके कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें इस ओर ध्यान देना होगा कि प्रकृति के संसाधनों का कितना प्रयोग करें कि भविष्य की पीढ़ी और प्राकृतिक वातावरण भी बना रहे। भौतिक सुख सुविधाओं एवं प्रकृति के दोहन का यदि हमें स्थाई समाधान देखना है तो वह भारतीय जीवन शैली की ओर जाना होगा।

उन्होंने कहा कि हम भारतीय संस्कृति और प्राचीन जीवन शैली से दूर होते जा रहे हैं। भारतीय जीवन मूल्य, तीज-त्योहार भी कहीं न कहीं प्रकृति के पास ही दिखाई पड़ते हैं। हमें यह ध्यान रखना होगा कि प्राकृतिक संसाधनों का आवश्यकता पड़ने पर ही प्रयोग करें। व्यर्थ में संसाधनों के दोहन से बचना होगा। वर्तमान में भारत में अक्षय ऊर्जा पर हो रहे कार्य से लगता है कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा के लिए प्रकृति का दोहन नहीं होगा वरन् अक्षय ऊर्जा ही प्रयोग में लाई जाएगी। उन्होंने बताया कि दुनिया का सबसे बड़ा सोलर पार्क भारत के जोधपुर जिला में है, जिसमें लगभग 2050 मैगावाट ऊर्जा उत्पन्न होती है।

उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि हमें पश्चिमी सभ्यता की ओर न बढ़कर भारतीय जीवन शैली की ओर जाना चाहिए और अपनी संस्कृति पर ही गर्व करना चाहिए। उन्होंने भारत में प्रकृति और नदियों के बारे में कहा कि भारत में लगभग 300 दिन सूर्य दिखाई देता है जिसे हम सौर ऊर्जा के लिए प्रयोग कर सकते हैं। यहां कई सदाबहार नदियां हैं जो हर समय बहती हैं, उसका हाइड्रोपॉवर के लिए प्रयोग किया जा सकता है। हर तरह का वातावरण हमारे पास है, जिसके अनुसार विश्व भर में उगाई जाने वाली चीजें भारत में भी उगाई जा सकती हैं। हमारा देश प्रकृति प्रदत्त राष्ट्र है।

उन्होंने पर्यावरण पर जागरूकता के लिए कहा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए आपस में विचार-विमर्श और चर्चाएं करनी चाहिए, इससे आपस में, आने वाली पीढ़ी में जागरूकता आएगी। बच्चों पर इसका बहुत प्रभाव पड़ता है क्योंकि वे बचपन से ही पर्यावरण के प्रति सजग हो जाते हैं और जागरूक नागरिक बनते हैं। उन्होंने कहा कि हमें पर्यावरण बदलाव के लिए जो चीजें जिम्मेदार हैं, उन पर कार्य करने की आवश्यकता है। इसके लिए केवल सरकारी नियमों पर ही आश्रित न रहकर व्यक्ति, समाज और संगठन इसमें सहभागी बनता है तो अच्छे परिणाम सामने आएंगे। संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह ने वक्ता एवं देशभर से जुड़े सभी श्रोताओं का धन्यवाद किया और सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना के साथ व्याख्यान का समापन हुआ।

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