लेख-कामना कौशिक
सनातन में निष्ठा एवं विश्वास रखने वाली, महिलाओं के सम्मान एवं शिक्षा की समर्थक, मराठा साम्राज्य की महान कुशल एवं दूरदर्शी शासिका लोकमाता अहिल्याबाई होलकर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के वर्तमान अहमदनगर जिले के चौंडी गांव में शिंदे परिवार में हुआ था। पिता मनकोजी राव शिंदे एवं माता का नाम सुशीला शिंदे था। माता सुशीला शिंदे का अहिल्याबाई होलकर के जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। माता सुशीला शिंदे धर्म परायण, सरल एवं कर्तव्यनिष्ठ स्त्री थीं। अहिल्याबाई ने अपनी माताजी से जनसेवा, उदारता, त्याग के बारे में जाना। पिता मनकोजी राव शिंदे ग्राम प्रधान थे। 8 वर्ष की आयु में माता अहिल्याबाई होलकर का विवाह मालवा के सूबेदार खंडेराव होलकर के साथ संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात माता अहिल्याबाई ने न केवल एक कुशल गृहणी और माता की भूमिका निभाई अपितु अपने ससुर मल्हार राव होलकर से राजकाज और युद्ध नीति की शिक्षा भी ली।
वर्ष 1754 में कुम्हेर युद्ध जो भरतपुर के राजा महाराज सूरजमल और मराठा साम्राज्य के बीच था। मराठा साम्राज्य से रघुनाथ राव व मल्हार राव के नेतृत्व में यह युद्ध लड़ा गया था। इस युद्ध में अहिल्याबाई होलकर के पति खंडेराव वीरगति को प्राप्त हो गए। महज 21 वर्ष की अल्प आयु में माता अहिल्याबाई विधवा हो गईं।
विपत्ति यहीं पर नहीं टली। 1766 में उनके ससुर मल्हार राव का निधन हो गया। फिर माता अहिल्याबाई ने अपने ससुर मल्हार होलकर से सीखी राजनीतिक समझ व साहस के साथ होलकर राजवंश की बागडोर संभाली। एक कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ उन्होंने युद्ध में भी स्वयं सेना की कमान संभाली एवं आक्रमणकारियों से अपने राज्य की रक्षा की।
माता अहिल्याबाई होलकर ने अपने पति एवं ससुर की मृत्यु के बाद 1767 से 1795 तक मालवा साम्राज्य की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने शासिका होते हुए बालिका शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और विधवाओं के लिए अभूतपूर्व कार्य किए।
उन्होंने लैंगिक भेदभाव को तोड़ते हुए महिलाओं को आत्मनिर्भर एवं शिक्षित बनाने की दिशा में कई ऐतिहासिक कार्य किए, जैसे
उन्होंने पाठशालाओं की स्थापना की जहां केवल लड़के ही नहीं, लड़कियां भी समान रूप से शिक्षा ग्रहण करती थीं।
महिलाओं को केवल सैद्धांतिक शिक्षा ही नहीं दी अपितु उन्हें आत्मनिर्भर भी किया। उन्हें युद्ध कौशल में भी निपुण बनाया।
उन्होंने विधवाओं को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए विशेष सहायता प्रदान की। उन्होंने विधवाओं को उनके पति की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाने जैसे प्रगतिशील कानून बनाए।
उन्होंने अपने शासनकाल में महिलाओं के खिलाफ प्रचलित रूढ़िवादी विचारों का विरोध किया एवं महिलाओं के लिए एक आदर्श एवं न्यायपूर्ण समाज की नींव रखी।
उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया एवं विधवा पुनर्विवाह को मान्यता दी। दहेज प्रथा का विरोध किया।
सुरक्षा के लिए महिलाओं की एक टुकड़ी का गठन सेना में भी किया।
माता अहिल्याबाई होलकर धार्मिक विचार रखती थीं। सनातन में निष्ठा रखती थीं, जिसके फलस्वरूप उन्होंने विभिन्न मंदिरों, घाटों का निर्माण एवं पुनर्निर्माण किया। जिसमें मुख्य रूप से बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर, बनारस एवं गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। उन्होंने अपने कार्यकाल में राज्य को समृद्ध, सुदृढ़, शक्तिशाली एवं प्रभावशाली बनाया।
यह न्यायप्रिय शासिका से लोकमाता अहिल्याबाई होलकर बन गईं। इनके जीवन के संघर्ष से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री कमजोर एवं अबला नहीं होती। महिला परिवार के साथ-साथ समाज का भी निर्माण कर सकती है।
यहां पर स्पष्ट रूप से माता अहिल्याबाई के जीवन का एक संदेश यह भी है कि वह अपनी माता से नैतिकता, धार्मिकता एवं सरल जीवन को जानी थीं, वहीं अपने ससुर मल्हार राव से राजनीति के गुर और युद्ध की नीति सीखी थी, जिस कारण सफल शासिका के रूप में शासन किया।
यह तभी संभव हुआ जब कुटुंब के साथ रहा गया। आज की इस आधुनिक भागदौड़ से निकलकर परिवार के संग भी समय बिताएं। जैसे माता सुशीला शिंदे ने लोकमाता अहिल्याबाई होलकर को अच्छी शिक्षा दी व उनके जीवन का सफल निर्माण किया।
हम सबके परिवार में भी ऐसा सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। मात्र इसके लिए हमारे कुटुंब का एकत्र रहना होगा।