पूर्व गृह सचिव का बड़ा दावा, पांच करोड़ की रामचरितमानस का नहीं मिला कोई अता-पता
रामजी देख देख रहे हैं…
————————————
अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर उठे विवाद के बीच पूर्व केंद्रीय गृह सचिव डॉ. एस. लक्ष्मीनारायणन ने गंभीर दावा किया है। उनका कहना है कि 8 अप्रैल 2024 को उन्होंने करीब सवा क्विंटल वजनी, 24 कैरेट सोने की परत से सजी और लगभग पांच करोड़ रुपये मूल्य की रामचरितमानस राम मंदिर ट्रस्ट को भेंट की थी। लेकिन आज तक उन्हें दान की रसीद नहीं मिली और कुछ महीनों बाद यह रामचरितमानस मंदिर से गायब हो गई।
प्रशासनिक जीवन की साख, अब श्रद्धा के सवालों के केंद्र में
डॉ. एस. लक्ष्मीनारायणन 1970 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के वरिष्ठ IAS अधिकारी रहे हैं। वे भारत सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करने के बाद 1995-96 में पी. वी. नरसिम्हा राव सरकार के दौरान केंद्रीय गृह सचिव बने। चेन्नई के धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार से आने वाले लक्ष्मीनारायणन के पिता भी IAS अधिकारी थे। प्रशासनिक सेवा के साथ उनका धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से गहरा जुड़ाव रहा है।
पीढ़ियों की आस्था से राम मंदिर तक पहुंची स्वर्णमंडित रामचरितमानस
लक्ष्मीनारायणन का दावा है कि उनके परिवार के पास 1500 वर्ष से अधिक पुरानी रामायण आज भी सुरक्षित है और उनके पूर्वज पीढ़ियों से उसकी पूजा करते आए हैं। उनकी मां जीवनभर “राम-राम” लिखकर साधना करती रहीं। इसी पारिवारिक आस्था के कारण उन्होंने राम मंदिर में पूजा और दर्शन के लिए स्वर्णमंडित रामचरितमानस भेंट करने का निर्णय लिया, ताकि श्रद्धालु भी उसके दर्शन कर सकें।
सवाल सिर्फ एक ग्रंथ का नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता का भी है
यदि पूर्व गृह सचिव के दावे सही हैं तो प्रश्न केवल एक स्वर्णमंडित रामचरितमानस के गायब होने का नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास और मंदिर में आने वाले चढ़ावे के प्रबंधन का भी है। दूसरी ओर, यदि दावे तथ्यों से मेल नहीं खाते तो इसकी भी स्पष्ट और आधिकारिक जांच आवश्यक है। आस्था जितनी पवित्र होती है, उसकी व्यवस्था उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए। राम के नाम पर बने मंदिर में यदि दान का पूरा हिसाब सार्वजनिक नहीं होगा, तो सवाल केवल चढ़ावे पर नहीं, जवाबदेही पर भी उठेंगे।