खुदीराम बोस मात्र 18 वर्ष 8 माह एवं 8 दिन की आयु में ही देश के लिए पवित्र श्रीमदभगवद्गीता ग्रंथ को हृदय से लगाकर हसते हसते फांसी पर चढ़ गए
एन डी हिंदुस्तान
कुरुक्षेत्र । भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास क्रांतिकारियों के सैकड़ों साहसिक कारनामों से भरा पड़ा है। क्रांतिकारियों की सूची में ऐसा ही एक नाम है खुदीराम बोस का, जो मात्र 18 वर्ष 8 माह एवं 8 दिन की आयु में ही देश के लिए पवित्र श्रीमदभगवद्गीता ग्रंथ को हृदय से लगाकर हसते हसते फांसी पर चढ़ गए। खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में त्रैलोक्यनाथ बोस के यहां हुआ था। देश को आजाद कराने की ऐसी लगन लगी कि उन्होंने 9वीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। यह विचार अमर बलिदानी खुदीराम बोस की शहादत दिवस पर मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने व्यक्त किये। मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने अमर बलिदानी खुदीराम बोस को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। विद्यार्थियों ने खुदीराम बोस के जीवन से जुड़े अनेक रोमांचक प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत किये। सर्वश्रेष्ठ प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत करने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया।
डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने खुदी राम बोस के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में अनेक कम आयु के वीरों ने भी अपने प्राणों की आहुति दी है। उनमें खुदीराम बोस का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है।खुदीराम बोस को कुछ इतिहासकार देश के लिए फांसी पर चढ़ने वाला सबसे कम उम्र का क्रांतिकारी देशभक्त मानते हैं। खुदीराम बोस अठारह वर्ष की अल्पायु में शताब्दियों से बड़ा जीवन जीकर अमर हो गये। खुदीराम बोस बहुत सी छोटी उम्र में से ही जीवन की अनेक विषमताओं के बीच स्वयं को इतनी विशाल सोच और गहरे भावों वाला बनाकर अपना सब कुछ राष्ट्रहित में समर्पित कर देने का दृढ़ संकल्प वास्तव में अद्भुत एवं बेमिसाल है। खुदीराम बोस ने अपना जीवन उस उम्र में देश के समर्पित कर दिया, जब एक युवा अपने कैरियर को लेकर असमंजस में रहता है। उनके बलिदान ने 11 अगस्त, 1908 को इतिहास में दर्ज कर दिया।
डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा फांसी के बाद खुदीराम बोस इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे। इतिहासवेत्ता शिरोल के अनुसार बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिए वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया। देशभर में विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल बंद रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर ‘खुदीराम’ लिखा होता था।स्वतंत्रता आंदोलन के समय अनेक अंग्रेज अधिकारी भारतीयों से बहुत दुर्व्यवहार करते थे। ऐसा ही एक मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड उन दिनों मुज्जफरपुर, बिहार में तैनात था। वह छोटी छोटी बात पर भारतीयों को कड़ी सजा देता था। अतः क्रान्तिकारियों ने उससे बदला लेने का निश्चय किया।कोलकाता में प्रमुख क्रान्तिकारियों की एक बैठक में किंग्सफोर्ड को यमलोक पहुँचाने की योजना पर गहन विचार हुआ। उस बैठक में खुदीराम बोस भी उपस्थित थे। यद्यपि उनकी अवस्था बहुत कम थी; फिर भी उन्होंने स्वयं को इस खतरनाक कार्य के लिए प्रस्तुत किया। इसी अंग्रेज अधिकारी पर बम फेकने के सन्दर्भ में खुदीराम बोस को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी दी थी। खुदीराम बोस भारतीय मानस पटल पर सदैव अमर रहेंगे। कार्यक्रम का समापन वन्देमातरम से हुआ। कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के सदस्य, मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थी , शिक्षक आदि उपस्थित रहे।