Home Kurukshetra News ब्रह्मांडीय विस्तार और दार्शनिक प्रवचन की काव्यात्मक रचना का संवाद

ब्रह्मांडीय विस्तार और दार्शनिक प्रवचन की काव्यात्मक रचना का संवाद

by ND HINDUSTAN
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मेरी 15 सालों की काव्य साधना और तपस्या है सुन गुणवंता सुन बुद्धिवंताः डॉ. पाल कौर

एनडी हिन्दुस्तान

कुरुक्षेत्र।
 कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में पंजाबी विभाग द्वारा हरियाणा केंद्रीय पंजाबी लेखक संघ के सहयोग से डॉ. पाल कौर (भारतीय साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता पंजाबी कवयित्री) की पुस्तक ‘सुन गुणवंता सुन बुद्धिवंता’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय ‘सुन गुणवंता सुन बुद्धिवंता वस्तु विधि और दृष्टि’ रहा।

कार्यक्रम के आरंभ में पंजाबी विभागाध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह ने डॉ. पाल कौर और अतिथियों का पुष्पगुच्छ, फुलकारियाँ और सम्मान चिन्ह भेंट कर स्वागत किया। डॉ. कुलदीप सिंह ने सुन गुणवंता सुन बुद्धिवंता पुस्तक की विशिष्टता की चर्चा करते हुए शैली विधान की दृष्टि से एक अलग मानक स्थापित करने वाली पुस्तक बताया। उन्होंने कहा कि यह न केवल हमारे पंजाबी साहित्य की उपलब्धि है, बल्कि इसके माध्यम से पाल कौर ने हरियाणा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का सिर ऊँचा किया है।
मुख्य वक्ता डॉ. मनजिंदर सिंह जी ने डॉ. पाल कौर की पुस्तक सुन गुणवंता सुन बुद्धिवंता को पंजाबी कविता में एक नया मोड़ और नया मुकाम देने वाली रचना बताया। डॉ. मनजिंदर सिंह जी ने कहा कि इस पुस्तक का आधार ब्रह्ममंडी है, यह पुस्तक दार्शनिक बुद्धिजीवियों को संबोधित है, इसका आख्यान आर्य-पूर्व काल से महाराजा रणजीत सिंह के काल तक फैला हुआ है और इसमें कुछ बुनियादी संघर्ष भी देखने को मिलते हैं, पहला है आदिकाल का संघर्ष जिसमें आर्य और अनार्य की चर्चा है, दूसरा है सेमेटिक और आर्य सभ्यताओं का ऐतिहासिक संघर्ष और तीसरा है शास्त्रीय और लोक का संघर्ष जो इसमें देखने को मिलता है, संघर्षों में से एक जातिवाद और पितृसत्ता का भी है। डॉ. मनजिंदर सिंह ने इस पुस्तक के विभिन्न आयामों के बारे में बताया और इसके खुले अंत की बात की।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. राजिंदर सिंह भट्टी ने कहा कि इस पुस्तक में नाथ जोगियों से लेकर सूफी परंपरा तक, पंजाब की संपूर्ण संस्कृति को काव्य मंच पर कुशलतापूर्वक प्रस्तुत किया गया है। डॉ. पाल कौर की यह पुस्तक अत्यंत गहन अध्ययन की मांग करती है।
मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं डॉ. पाल कौर ने इसे अपने 15 वर्षों के अथक परिश्रम का परिणाम बताया। अपने विचार प्रस्तुत करते हुए, डॉ. पाल कौर ने विभागाध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह को इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए धन्यवाद दिया। हरसिमरन सिंह रंधावा ने पाल कौर की काव्य पुस्तक का विरेचन अरस्तू की साहित्य सृजन की अवधारणा जोड़ा। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ. रतन सिंह ढिल्लों ने डॉ. पाल कौर द्वारा अपनी पुस्तक में रचित मिथकों और किंवदंतियों के प्रयोग के बारे में बताया। डॉ. हरसिमरन सिंह रंधावा ने साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने पर गौरवान्वित महसूस करते हुए, डॉ. पाल कौर का हार्दिक स्वागत किया।
दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर सोहिंदर बीर ने कहा कि कविता व्यक्ति के अंतर्मन की परतों का उजागर करती है। डॉ. पाल कौर ने भी असीमित अंतर्द्वंदों को अभिव्यक्त किया है यही उनके इक बड़ी प्राप्ति है ।

तीसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता कर रही मैडम डॉ. परमजीत कौर सिद्धू ने पंजाबी भाषा की किसी महिला को 14 वर्षों के अंतराल के बाद साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक को केवल इतिहास की पुस्तक नहीं कहा जा सकता, जिस प्रकार दर्शनशास्त्र को समझने के लिए गहन अध्ययन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार इस ग्रन्थ को समझने के लिए दार्शनिक दृष्टिकोण का होना अत्यंत आवश्यक है।
विशेष अतिथि के रूप में डॉ. चूहड़ सिंह (प्रधानाचार्य गुरु नानक खालसा कॉलेज करनाल), डॉ. गुरिंदर सिंह हांडा (पूर्व प्राचार्य गुरु नानक खालसा कॉलेज करनाल), डॉ. चरणजीत कौर (प्रसिद्ध पंजाबी लेखिका एवं विचारक), डॉ. नायब सिंह मंडेर (प्रसिद्ध पंजाबी लघुकथाकार), प्रो. गुरचरण सिंह जोगी (प्रसिद्ध पंजाबी कवि) डॉ. दलजीत कौर (प्राचार्य, एसएमएस खालसा लबाना गर्ल्स कॉलेज, बराड़ा) शामिल थे।

डॉ. प्रवीण कुमार, डॉ. तरलोचन मीर, डॉ. तिलकराज, डॉ. करणदीप सिंह, डॉ. गुरप्रीत सिंह साहूवाला, डॉ. बलवान सिंह औजला, डॉ. दविंदर बीबीपुरिया, डॉ. बलजिंदर सिंह, डॉ. सरबजीत कौर, डॉ. जगमोहन सिंह ने विभिन्न शोध पत्र पढ़े। कार्यक्रम का संचालन विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. लता खेड़ा और डॉ. सुखजीत कौर ने किया, जिन्होंने उद्घाटन सत्र और तीन तकनीकी सत्रों का सुचारू संचालन किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. लता खेड़ा जी ने अतिथियों का धन्यवाद किया।

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