अपने धर्म का पालन करना ही श्रेयस्करः प्रो. सोमनाथ सचदेवा
10वें अंतर्राष्ट्रीय गीता सम्मेलन 2025 का हुआ समापन
एनडी हिन्दुस्तान
कुरुक्षेत्र। यदि गीता को समझना है तो स्वयं अर्जुन बनना होगा क्योंकि जिस प्रकार अर्जुन का मन विषादों से घिरा हुआ था उसी प्रकार आज प्रत्येक व्यक्ति का मन भिन्न-भिन्न विषादों से घिरा है। गीता का अर्थ है स्वधर्म अर्थात् मेरा धर्म क्या है। स्वयं को जानना ही स्वधर्म है। जिसने अपने स्वधर्म को जान लिया उसने अपने जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर लिया। यह विचार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विमर्श टोली के सदस्य मुकुल कानिटकर ने बुधवार को सीनेट हाल में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, विदेश मंत्रालय और कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में श्रीमद्भगवद्गीतोक्त स्वधर्मः कर्तव्यनिष्ठा, शांति, सद्भावना एवं स्वदेशी की प्रेरणा विषय पर आयोजित 10वें अंतर्राष्ट्रीय गीता सम्मेलन 2025 के समापन अवसर मुख्य वक्ता के तौर पर व्यक्त किए। समापन अवसर पर प्रतिभागियों को सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र पुरस्कार और सम्मेलन के लिए बनाई गई कमेटियों के संयोजक व सदस्यों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए।
मुकुल कानिटकर ने कहा कि आप जैसा चाहते हो जीवन में वैसा ही करना चाहिए।अनंत संभावनाओं का नाम मनुष्य है। हमें दूसरे की नकल नहीं करनी चाहिए क्योकि हम स्वयं ही श्रेष्ठ हैं। अपना धर्म श्रेष्ठ है। गीता के आरंभ से लेकर अंत तक अर्थ है मेरा धर्म अर्थात् स्वधर्म। जो कार्य व्यक्ति स्वयं कर सकता है उसे कोई दूसरा नहीं कर सकता इसलिए एआई से डरने व घबराने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि व्यक्ति श्रेष्ठ है। एआई का निर्माण भी व्यक्ति ने ही किया है। इसलिए यह चिंता व्यर्थ की है कि एआई के प्रयोग से मनुष्य की उपयोगिता कम हो जाएगी। जिस व्यक्ति ने यह जानने की कोशिश कि मैं कौन हूं। आज उसका नाम पूरा विश्व जानता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से प्रश्न पूछना चाहिए। हमें जीवन में हमेशा दूसरों के लिए कार्य करना चाहिए। जब हम दूसरों की सेवा करेंगे तब हमारा मूल्य बढेगा। जीवन में स्वभाव, स्वधर्म व स्वकर्म अत्यंत आवश्यक है। जिस कार्य को करने में सबसे अधिक आनंद आता है वही कार्य व्यक्ति को करना चाहिए।
तीन दिनों तक चलने वाले सम्मेलन के समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए व मुख्य वक्ता का स्वागत करते हुए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि स्वधर्म का अर्थ है कि हमें जीवन में वह कार्य करना चाहिए जिससे हमें सफलता मिलती है। उसी कार्य में फल भी ज्यादा मिलता है। अपने धर्म का पालन करना श्रेयस्कर है। यही गीता कहती है। लोगों के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए और निष्काम कर्म करते हुए अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना चाहिए। हर रूकावटों व चुनौतियों से पार पाने का रास्ता गीता में है।
कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि व्यक्ति को अपने मन पर नियंत्रण करना चाहिए। सबसे ज्यादा आवश्यकता युवा पीढ़ी को है जो अपना अधिकतम समय मोबाइल पर व्यतीत कर रही है। वह अपने पर नियंत्रण करें और अपने उद्देश्य के लिए मोबाइल का प्रयोग करें न कि समय व्यतीत करने के लिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सात्विक जीवन अपनाना चाहिए और गीता को आत्मसात करते हुए जीवन में आगे बढ़ना चाहिए। मंच का संचालन डॉ. निधि माथुर ने किया। प्रो. वनिता ढींगरा, उप निदेशक, आईजीसी-2025 ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. वीरेन्द्र पाल, डीन ऑफ कॉलेजिज प्रो. ब्रजेश साहनी, सम्मेलन निदेशक प्रो. तेजेन्द्र शर्मा, प्रो. मंजुला चौधरी, प्रो. अवनेश वर्मा, डॉ. प्रीतम सिंह, डॉ. हरदीप शर्मा, लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया, उप-निदेशक डॉ. जिम्मी शर्मा, डॉ. आनंद कुमार, डॉ. सलोनी दिवान, डॉ. कुशविन्द्र कौर, डॉ. सीडीएस कौशल, डॉ. गुरचरण सिंह, डॉ. सुशील टाया सहित शिक्षक, शोधार्थी मौजूद रहे।