चैत्र कृष्ण चौदस 18 मार्च को होगी अष्टकोशी यात्रा
सुबह 5 बजे से लेकर सायं 6 बजे तक पूरी की जाएगी यात्रा
उपाध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं की ली बैठक
एनडी हिन्दुस्तान
कुरुक्षेत्र। हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष धुमन सिंह किरमच ने कहा कि कुरुक्षेत्र के अष्टकोशी तीर्थों की यात्रा ऐतिहासिक और यादगार होगी। यह अष्टकोशी यात्रा चैत्र कृष्ण चौदस 18 मार्च को निकाली जाएगी। यह यात्रा लगभग 5 बजे दर्रा खेडा नाभ कमल मंदिर से शुरू होगी।सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष धुमन सिंह किरमच सोमवार को जिला भाजपा कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के मार्गदर्शन में कुरुक्षेत्र की प्राचीन और ऐतिहासिक परम्पराओं को जीवंत करने का प्रयास किया जा रहा है। इन प्रयासों में अष्टïोशी यात्रा भी शामिल है। यह अष्टकोशी यात्रा चैत्र कृष्ण चौदस 18 मार्च को सुबह 5 बजे शुरू होगी और सायं 6 बजे यात्रा का समापन होगा। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र की परिक्रमा वास्तव में सन्निहित सरोवर की परिक्रमा है इस तीर्थ का विस्तार चारों दिशाओं में दो दो कोस था तीर्थ के तट पर स्थापित मंदिरों में दान व स्नान की परम्परा सदियों से चली आ रही है कुरुक्षेत्र की अष्टकोशी परिक्रमा भी पितृ जनों की मुक्ति दिलाने वाली व अक्षय फल प्राप्त गामी होती है।उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र अष्टकोशी परिक्रमा हजारों साल पुरानी है सर्वप्रथम ब्रह्मा विष्णु महेश त्रिदेवों ने उपवास रख जन नियंता भगवान ने सृष्टि का निर्माण करने के लिए अष्टकोशी की परिक्रमा की और अपने-अपने देवत्व भार को ग्रहण कर सृष्टि संयोजन का कार्य प्रारंभ किया त्रिदेवों के पश्चात सैकड़ों सालों से सदैव प्रतिवर्ष देवता और धार्मिक पुरुषों ने अष्टकोशी भूमि की यात्रा अनवरत रूप से जारी रखी एक बार यात्रा करने पर मनुष्य की समस्त मनोकामना को पूरा करने वाली दो बार अष्टकोसी यात्रा करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है तीन बार अष्टकोसी यात्रा करने पर अक्षय लोको की प्राप्ति होती है उन्होंने कहा कि आदिकाल से चली आ रही यह परिक्रमा साहसिक तीर्थ यात्रा है खेतों की छोटी-छोटी पगडंडी पर सरस्वती नदी के किनारे किनारे चलते हुए लगभग 24 किलोमीटर की यह यात्रा सूर्योदय से नाभकमल मंदिर से चलकर नाभ कमल मंदिर में सूर्यास्त तक पूर्ण होती है कुरुक्षेत्र मोक्षदायक धार्मिक प्रसिद्ध ऐतिहासिक तीर्थ है। यह केवल महाभारत युद्ध भूमि ही नहीं भगवान कृष्ण के मुखारविंद से प्रकट हुई गीता जन्मस्थली भी है राजा कुरु के अष्टांग योग यज्ञ,तप ,सत्य, क्षमा, दया, शौच ,दान ,ब्रह्मचर्य से परिपूर्ण मोक्ष प्रदायक स्थान भी है। यह यात्रा नाभकमल तीर्थ से सरस्वती के किनारे ओजस तीर्थ और वहीं से सरस्वती के किनारे किनारे होते हुए स्थानेश्वर तीर्थ, कुबेर तीर्थ, बदर पाचन तीर्थ ,क्षीर सागर तीर्थ,पूर्ववाहिनी सरस्वती तीर्थ खेडी मारकंडा,दधीचि तीर्थ,वृद्ध कन्या तीर्थ ,रन्तुक यक्ष, पावन तीर्थ ,औघड़ तीर्थ ,बाणगंगा,उपगया तीर्थ, नरकतारी बाणगंगा से होते हुए नाभकमल पर समाप्त होती है।