बुल्गारिया ने उपनिषद एवं हनुमान चालिसा को 30 से अधिक देशों में किया प्रचारित
न्यूज डेक्स संवाददाता
कुरुक्षेत्र,12 अक्तूबर। बुल्गारिया ने भारतीय उपनिषदों एवं हनुमान चालिसा का बुल्गारियन भाषा में अनुवाद कर 30 से अधिक देशों में उसे प्रचारित एवं प्रसारित किया है। हिन्दी एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए बुल्गारिया कटिबद्ध है। यह उद्गार सोफिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. मोना कौशिक ने देवम् प्रतिष्ठान एवं विरासत की ओर आयोजित वेब गोष्ठी में अभिव्यक्त किए।
ऑनलाईन गोष्ठी में हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. चन्द्र त्रिखा ने कहा कि हिन्दी भाषा नहीं संस्कृति है। हिन्दी ने सदैव अपनी सहोदर भाषाओं को अपने आंचल में लेकर भारत की संस्कृति को वैश्विक स्वरूप देने का प्रयास किया है। इस मौके पर पोलैंड से आईसीसीआर के भारतीय प्रतिनिधि सुंधाशु कुमार शुक्ला ने कहा कि पोलैंड में भारतीय संस्कृति के प्रति जो सम्मान है वो यहां के विश्वविद्यालयों एवं शोध कार्यों में झलकता है।
उन्होंने कहा कि यहां के विश्वविद्यालयों में अनेकों ऐसे रिसर्च स्कॉलर एवं विद्वान हैं जिन्होंने राम एवं कृष्ण पर पी.एचडी. कर भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी आस्था जताई है। उन्होंने कहा कि भारत और पोलैंड का अटूट रिश्ता है। द्वितीय विश्व युद्ध में भी पोलैंड के लोगों ने अनेकों भारतीयों की रक्षा कर उदारता का परिचय दिया था।
इस मौके पर राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान बीएल गौड ने कहा कि संस्कृत से ही संस्कृति का जन्म हुआ है। संस्कृत भाषा के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय फलक पर भारत की संस्कृति को एक नई पहचान मिली है। उन्होंने कहा कि हिन्दी, पाली, प्राकृत, उर्दू सभी भाषाएं भारतीय संस्कृति की संवाहिका हैं।
इस मौके पर युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष आईआईएचएस डॉ. महासिंह पूनिया ने कहा कि हिन्दी विश्व में सबसे अग्रणी भाषा बनने जा रही है। 2050 तक यह विश्व की पहले नं. पर बोले जाने वाली भाषा होगी। उन्होंने कहा कि हिन्दी का प्रयोग अंग्रेजी के मुकाबले बढ़ा है। अंग्रेजी में जहां 19 प्रतिशत प्रकाशित सामग्री सालाना की बढ़ोतरी देखी गई वहीं पर हिन्दी में यह बढ़ोतरी 94 प्रतिशत से अधिक थी।
इसके साथ ही लोग यू-ट्यूब पर 93 प्रतिशत से अधिक हिन्दी के वीडिय़ो का अवलोकन करते हैं। इस मौके पर सगोष्ठी के अंत में हिन्दी सांस्कृतिक विरासत और वर्तमान परिदृश्य पर व्याख्यान के पश्चात डॉ. मोना कौशिक एवं डॉ. महासिंह पूनिया ने हृदय से आभार जताया।