Home Kurukshetra News सा विद्या या विमुक्तये की उक्ति को सार्थक करेगी राष्ट्रीय शिक्षा नीति: प्रो. चंद्रभूषण शर्मा

सा विद्या या विमुक्तये की उक्ति को सार्थक करेगी राष्ट्रीय शिक्षा नीति: प्रो. चंद्रभूषण शर्मा

by ND HINDUSTAN
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‘स्वतंत्र भारत में शिक्षा व्यवस्था’ विषय पर व्याख्यान आयोजित

न्यूज डेक्स संवाददाता

कुरुक्षेत्र, 5 दिसम्बर। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान द्वारा ‘स्वतंत्र भारत में शिक्षा व्यवस्था’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान में मुख्य-वक्ता प्रोफेसर चंद्रभूषण शर्मा, सुविख्यात शिक्षाविद्, शिक्षा विद्यापीठ, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय नई दिल्ली एवं पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान थे। अध्यक्षता विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय मंत्री श्री शिवकुमार ने की।

संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह ने अतिथि परिचय कराते हुए बताया कि प्रो. चंद्रभूषण शर्मा को तीन दशकों का शिक्षण अनुभव है। डिजिटल पहल के राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान डिजिटल पहल के लिए सराहनीय योगदान हेतु उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार प्रदान किया गया है। वे सर्व शिक्षा अभियान के प्रोजेक्ट ‘‘दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम’’ के निदेशक भी रहे। उन्हें वर्ष 2016 में दूरस्थ शिक्षा में संस्थागत उपलब्धि के लिए ‘लर्निंग ऑफ एक्सीलेंस’ अवार्ड भी प्रदान किया गया। वे राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रमुख वक्ता के रूप में जाने जाते हैं।

विद्या भारती के राष्ट्रीय मंत्री श्री शिवकुमार ने आशीर्वचन प्रदान करते हुए कहा कि भारत के स्वतंत्र होने के उपरांत से लेकर अनेक नीतियां बनीं परंतु वह ठीक प्रकार से लागू नहीं हो सकीं। जो लागू हुईं, वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हुईं। अब वर्तमान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षा क्षेत्र में लागू हुई है। इसमें बालकों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक सभी तत्व उपलब्ध हैं। उन्हें क्रियान्वित करने के लिए विभिन्न प्रकार तथा माध्यमों का उपयोग करते हुए हमें विश्वास है कि शिक्षा जगत में अपेक्षित परिवर्तन अवश्य दिखाई देगा।

मुख्य वक्ता प्रोफेसर चंद्रभूषण शर्मा ने कहा कि आजादी के पूर्व की शिक्षा नीति को बढ़ावा देने का जो प्रयास रहा था, उसमें वर्ष 2020 मील का पत्थर बनेगा, जिसमें देखा जाएगा कि भारत की शिक्षा एक नई दिशा में चली है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की तरफ ध्यान दिलाते हुए कहा कि जो शिक्षा से वंचित रह गए, उनकी चिंता हमें करनी है। वे वह हैं जो दूर-दराज क्षेत्रों में रहते हैं। पिछड़े इलाकों से आते हैं। जिनके परिवारों में माता-पिता विद्यालयों में नहीं गए, वे बच्चे विद्या की परम्परा से बाहर हैं, ऐसे बच्चों को शिक्षित करना इस शिक्षा नीति में सम्मिलित किया गया है। इनको मातृभाषा में शिक्षा दी जाएगी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति उन बच्चों की चिंता भी करती है जो गरीब बच्चे रात को भूखे ही सो जाते हैं और सुबह खाली पेट रहते हैं। ऐसे में सुबह अल्पाहार का प्रबंध भी इसमें किया गया है। उन्होंने बताया कि 1937 में महात्मा गांधी ने भी बुनियादी शिक्षा की बात कही थी। वर्ष 1947 में स्वतंत्रता के पश्चात राधाकृष्णन के उच्च शिक्षा कमीशन एवं 1952-53 में सैकेंडरी एजूकेशन कमीशन पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। अंग्रेजी भाषा को कॉमन भाषा बनाना और इसे अंतर्राज्यीय भाषा बनाना, उसमें ही सारा कामकाज होना, उसका खामियाजा आज तक भुगत रहे हैं। उस समय जरूरी था कि देश की एक भाषा होगी, जिसमें हम सब बातचीत करेंगे। लेकिन राज्य की भाषा को भी स्वीकार किया जाएगा। जोकि 2020 की शिक्षा नीति में है।


प्रो. शर्मा ने शिक्षा को व्यापार के क्षेत्र में लाने की परिपाटी और प्राचीन परम्परा ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ में अंतर बताते हुए कहा कि विद्या तो दीया है, दीये से दीये को जलाओ, और ज्ञान रूपी प्रकाश बढ़ाओ। ये बांटने की चीज है। जितना बांटेंगे, उतना बढ़ेगी। यह हमारे मानस में बचपन से बैठाया जाता है। लेकिन विश्व व्यापार संगठन के अनुसार शिक्षा तो व्यापार का आयाम है, जिसे हम खरीद बेच सकते हैं। इस सब को 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्पष्ट कर दिया गया है कि हम विद्या की परम्परा में हैं, व्यापार की परम्परा में नहीं।

उन्होंने 2009 में ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून पर कहा कि जिस विचार को लेकर यह कानून बनाया गया तो 2020 तक 2 करोड़ बच्चे शिक्षा से बाहर क्यों हैं? इस कानून में कहीं न कहीं गलतियां थीं जो समझ नहीं पाए। उन्होंने विद्या भारती, एकल विद्यालय, शिशु वाटिकाएं जैसी संस्थाओं की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि ये संस्थाएं सही मायने में शिक्षा को बच्चों तक पहुंचा रही हैं।

उन्होंने कहा कि राधाकृष्णन कमीशन से नेशनल नॉलेज कमीशन तक कोई प्रयास नहीं किया गया जिसमें देश के बच्चों को बताया जाए कि हमारा देश पांच हजार वर्ष पुराना है, जिसका अपना साहित्य है और उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम तक हम एक जैसा सोचते हैं। अलग-अलग भाषाओं में सोचें लेकिन एक जैसा सोचते हैं, जिसे एक विचारधाारा के नाम से भी जाना जा सकता है। वह विचारधारा है ‘सा विद्या या विमुक्तये’ या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इस नीति को हम ठीक से लागू करते हैं तो राष्ट्रहित में बड़ा काम होगा। जो काबिल होंगे वही शिक्षा में ऊपर जाएंगे और जो पढ़ाई में ज्यादा अच्छे नहीं होंगे वे वोकेशनल में जाएंगे।

संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह ने वक्ता एवं देशभर से जुड़े सभी श्रोताओं का धन्यवाद किया और आगामी व्याख्यान जो प्रत्येक शनिवार को सायं 4 से 5 बजे तक प्रसारित किया जाएगा, उससे जुड़ने की अपील करते हुए सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना के साथ व्याख्यान का समापन हुआ।

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